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रोहिंग्या : सुरक्षा की बड़ी चुनौती के बीच राजनीति का मुद्दा, समाधान की तलाश
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जम्मू। दुनिया 20 जून को विश्व शरणार्थी दिवस मना रही है लेकिन जम्मू में म्यांमार से आए रोहिंग्याओं की मौजूदगी डेढ़ दशक से अनसुलझी बहस का केंद्र बनी है। संवेदनशील भौगोलिक स्थिति, अंतरराष्ट्रीय सीमा से नजदीकी और सैन्य प्रतिष्ठानों की मौजूदगी के कारण जम्मू में यह विषय केवल मानवाधिकार तक सीमित नहीं है बल्कि सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीतिक एजेंडे से जुड़ चुका है।
आंकड़ों के अनुसार जम्मू-कश्मीर में रोहिंग्याओं की संख्या 15 से 18 हजार के बीच है। इनमें काफी आबादी जम्मू जिले के बठिंडी, नरवाल, सुंजवां, छन्नी रामा और शहर के बाहरी हिस्सों में बस्तियां बनाकर रह रही है।
जम्मू में रोहिंग्याओं का आना वर्ष 2009 के आसपास शुरू हुआ थी, जब सईद हुसैन नामक व्यक्ति ने बठिंडी में पहला ठिकाना बनाया। वर्ष 2012 के बाद म्यांमार से परिवारों के आने के सिलसिले में तेजी आई। स्थानीय संगठनों का आरोप है कि शुरुआती दौर में पहचान और दस्तावेज की पुख्ता जांच न होने के कारण यह मुद्दा आज बड़े सामाजिक और राजनीतिक विवाद का रूप ले चुका है।
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आखिर जम्मू में ही क्यों है विरोध
कश्मीर घाटी की तुलना में जम्मू क्षेत्र में रोहिंग्याओं का विरोध सबसे ज्यादा रहा है। मुख्य वजह यह है कि ये बस्तियां राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे स्टेशन और महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों के बेहद करीब हैं। जम्मू लंबे समय से सुरक्षा और जनसांख्यिकी संतुलन को लेकर संवेदनशील रहा है जिसके चलते बस्तियों की रणनीतिक स्थिति पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
सुरक्षा एजेंसियों की बढ़ी चिंता
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि यहां रहने वाले हर विदेशी नागरिक का सत्यापित रिकॉर्ड होना अनिवार्य है। इसी कड़ी में मार्च 2021 में प्रशासन ने बड़े स्तर पर बायोमेट्रिक सत्यापन अभियान चलाया था जिसके बाद करीब 300 रोहिंग्याओं को हीरानगर स्थित होल्डिंग सेंटर में स्थानांतरित किया गया था। इस कदम को एक पक्ष ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी माना तो दूसरे ने मानवाधिकार का मुद्दा बनाया।
फर्जी पहचान पत्र और शादियों के सिंडिकेट का भंडाफोड़
विवाद का बड़ा पहलू अवैध रूप से सरकारी दस्तावेज हासिल करना भी रहा है। समय-समय पर फर्जी राशन कार्ड और अन्य पहचान पत्र मिलने के मामले सामने आए हैं। हाल ही में रोहिंग्या महिला को डोमिसाइल जारी होने का मामला सुर्खियों में रहा था। पुलिस जांच में मानव तस्करी से जुड़े ऐसे नेटवर्क का भी पर्दाफाश हुआ है जो रोहिंग्या और बांग्लादेशी महिलाओं को बहला-फुसलाकर स्थानीय लोगों से शादियां कराने के अवैध कारोबार में लिप्त थे। पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि पिछले पांच वर्षों में चोरी, तस्करी और फर्जी दस्तावेज से जुड़े 60 से अधिक मामले दर्ज हो चुके हैं।
डेढ़ दशक बाद भी स्थायी नीति का इंतजार
सेवानिवृत्त कर्नल सुशील पठानिया कहते हैं कि करीब 15 वर्ष बीतने के बाद भी गंभीर समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सका है। प्रशासन समय-समय पर सत्यापन अभियान चलाता है, सुरक्षा एजेंसियां निगरानी बढ़ाती हैं और राजनीतिक दल बस्तियों की बिजली-पानी काटने जैसे मुद्दों पर अपना रुख अख्तियार करते हैं। जम्मू जैसे सीमावर्ती क्षेत्र में अवैध विदेशी नागरिकों को लेकर राष्ट्रीय नीति और ठोस समाधान का आज भी इंतजार है।
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आंकड़ों के अनुसार जम्मू-कश्मीर में रोहिंग्याओं की संख्या 15 से 18 हजार के बीच है। इनमें काफी आबादी जम्मू जिले के बठिंडी, नरवाल, सुंजवां, छन्नी रामा और शहर के बाहरी हिस्सों में बस्तियां बनाकर रह रही है।
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जम्मू में रोहिंग्याओं का आना वर्ष 2009 के आसपास शुरू हुआ थी, जब सईद हुसैन नामक व्यक्ति ने बठिंडी में पहला ठिकाना बनाया। वर्ष 2012 के बाद म्यांमार से परिवारों के आने के सिलसिले में तेजी आई। स्थानीय संगठनों का आरोप है कि शुरुआती दौर में पहचान और दस्तावेज की पुख्ता जांच न होने के कारण यह मुद्दा आज बड़े सामाजिक और राजनीतिक विवाद का रूप ले चुका है।
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आखिर जम्मू में ही क्यों है विरोध
कश्मीर घाटी की तुलना में जम्मू क्षेत्र में रोहिंग्याओं का विरोध सबसे ज्यादा रहा है। मुख्य वजह यह है कि ये बस्तियां राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे स्टेशन और महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों के बेहद करीब हैं। जम्मू लंबे समय से सुरक्षा और जनसांख्यिकी संतुलन को लेकर संवेदनशील रहा है जिसके चलते बस्तियों की रणनीतिक स्थिति पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
सुरक्षा एजेंसियों की बढ़ी चिंता
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि यहां रहने वाले हर विदेशी नागरिक का सत्यापित रिकॉर्ड होना अनिवार्य है। इसी कड़ी में मार्च 2021 में प्रशासन ने बड़े स्तर पर बायोमेट्रिक सत्यापन अभियान चलाया था जिसके बाद करीब 300 रोहिंग्याओं को हीरानगर स्थित होल्डिंग सेंटर में स्थानांतरित किया गया था। इस कदम को एक पक्ष ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी माना तो दूसरे ने मानवाधिकार का मुद्दा बनाया।
फर्जी पहचान पत्र और शादियों के सिंडिकेट का भंडाफोड़
विवाद का बड़ा पहलू अवैध रूप से सरकारी दस्तावेज हासिल करना भी रहा है। समय-समय पर फर्जी राशन कार्ड और अन्य पहचान पत्र मिलने के मामले सामने आए हैं। हाल ही में रोहिंग्या महिला को डोमिसाइल जारी होने का मामला सुर्खियों में रहा था। पुलिस जांच में मानव तस्करी से जुड़े ऐसे नेटवर्क का भी पर्दाफाश हुआ है जो रोहिंग्या और बांग्लादेशी महिलाओं को बहला-फुसलाकर स्थानीय लोगों से शादियां कराने के अवैध कारोबार में लिप्त थे। पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि पिछले पांच वर्षों में चोरी, तस्करी और फर्जी दस्तावेज से जुड़े 60 से अधिक मामले दर्ज हो चुके हैं।
डेढ़ दशक बाद भी स्थायी नीति का इंतजार
सेवानिवृत्त कर्नल सुशील पठानिया कहते हैं कि करीब 15 वर्ष बीतने के बाद भी गंभीर समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सका है। प्रशासन समय-समय पर सत्यापन अभियान चलाता है, सुरक्षा एजेंसियां निगरानी बढ़ाती हैं और राजनीतिक दल बस्तियों की बिजली-पानी काटने जैसे मुद्दों पर अपना रुख अख्तियार करते हैं। जम्मू जैसे सीमावर्ती क्षेत्र में अवैध विदेशी नागरिकों को लेकर राष्ट्रीय नीति और ठोस समाधान का आज भी इंतजार है।