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थोड़ी सी पूजा से ही प्रसन्न हो जाते हैं भोलेनाथ : शास्त्री
Tue, 30 Jul 2024 06:20 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, जम्मू
संवाद न्यूज एजेंसी, जम्मू
Updated Tue, 30 Jul 2024 06:20 AM IST
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श्री सनातन धर्म सभा में शिव महा पुराण कथा जारी
संवाद न्यूज एजेंसी
रियासी। भगवान भोले नाथ बहुत ही भोले हैं। वह थोड़ी सी पूजा करने से ही प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए संगत को भोले की हमेशा पूजा करनी चाहिए। साथ ही कथा सुननी चाहिए। यह ज्ञान सूरज शास्त्री ने श्री सनातन धर्म सभा में जारी महा शिव पुराण कथा के आठवें दिन संगत को दिया।
उन्होेंने बताया कि ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना शिव-पार्वती का ध्यान में रख कर की थी। इसलिए शिव को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। शास्त्री ने यज्ञ दत्त नामक एक ब्राह्मण का प्रसंग सुनाया। बताया कि वह कांपिल्य नगर में रहता था और उसने अपने आठ वर्षीय पुत्र गुणनिधि को सभी संस्कारों की शिक्षा दी थी।
लेकिन, कुछ समय बाद बेटे में अवगुण आ गए। वह महफिलों में जाने के साथ ही जुआ खेलने लगा। गुणनिधि पिता की चुराई हुई अंगुठी को जुए में हार गया। गुणनिधि की संगत के बारे में जब पिता को पता चला तो लज्जा में उसका सिर झुक गया। पत्नी से पूछे जाने पर गलत जवाब मिलने पर मां और बेटे का त्याग कर देता है। गुणनिधि ने घर छोड़ दिया और वह पश्चाताप करने लगा। भूख-प्यास से व्याकुल होने पर वह एक शिव मंदिर के बाहर बैठ जाता है। एक दिन मंदिर से पकवान लेकर भागने लगा, लेकिन उसे लोगों ने पकड़ लिया।
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पिटाई से उसकी मौत हो गई। यमदूत उसे ले जाने वाले ही होते हैं कि तभी शिव गण भी पहुंच जाते हैं। वह गुणनिधि को शिवलोक में ले जाने लगते हैं। बताते है कि उसने कई अधर्म कार्य किए लेकिन इस बीच शिवलिंग की पूजा भी की। व्रत रखा और मंदिर में दरवाजे पर बैठा रहा। उसे शिवलोक ले जाया गया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
रियासी। भगवान भोले नाथ बहुत ही भोले हैं। वह थोड़ी सी पूजा करने से ही प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए संगत को भोले की हमेशा पूजा करनी चाहिए। साथ ही कथा सुननी चाहिए। यह ज्ञान सूरज शास्त्री ने श्री सनातन धर्म सभा में जारी महा शिव पुराण कथा के आठवें दिन संगत को दिया।
उन्होेंने बताया कि ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना शिव-पार्वती का ध्यान में रख कर की थी। इसलिए शिव को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। शास्त्री ने यज्ञ दत्त नामक एक ब्राह्मण का प्रसंग सुनाया। बताया कि वह कांपिल्य नगर में रहता था और उसने अपने आठ वर्षीय पुत्र गुणनिधि को सभी संस्कारों की शिक्षा दी थी।
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लेकिन, कुछ समय बाद बेटे में अवगुण आ गए। वह महफिलों में जाने के साथ ही जुआ खेलने लगा। गुणनिधि पिता की चुराई हुई अंगुठी को जुए में हार गया। गुणनिधि की संगत के बारे में जब पिता को पता चला तो लज्जा में उसका सिर झुक गया। पत्नी से पूछे जाने पर गलत जवाब मिलने पर मां और बेटे का त्याग कर देता है। गुणनिधि ने घर छोड़ दिया और वह पश्चाताप करने लगा। भूख-प्यास से व्याकुल होने पर वह एक शिव मंदिर के बाहर बैठ जाता है। एक दिन मंदिर से पकवान लेकर भागने लगा, लेकिन उसे लोगों ने पकड़ लिया।
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पिटाई से उसकी मौत हो गई। यमदूत उसे ले जाने वाले ही होते हैं कि तभी शिव गण भी पहुंच जाते हैं। वह गुणनिधि को शिवलोक में ले जाने लगते हैं। बताते है कि उसने कई अधर्म कार्य किए लेकिन इस बीच शिवलिंग की पूजा भी की। व्रत रखा और मंदिर में दरवाजे पर बैठा रहा। उसे शिवलोक ले जाया गया।