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Jammu News: याचिका खारिज, मुमतजा पर 50,000 रुपये का जुर्माना
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति विनोद चटर्जी कौल ने मुमतजा अख्तर की याचिका को खारिज करते हुए तथ्यों को छिपाने के लिए 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया।
याचिकाकर्ता ने 17 अक्टूबर 2024 के आदेश संख्या 84-एसकेआईसीसी को चुनौती दी थी, जिसमें जी नाथ राशिद को एसकेआईसीसी में ऑफिस असिस्टेंट/टाइपिस्ट के रूप में अस्थायी नियुक्ति दी गई थी, जिसे 1994 के एसआरओ 43 के तहत स्वीकृत किया गया था। याचिकाकर्ता ने इस आदेश को रद्द करने की मांग की थी।
मुमतजा अख्तर 1 अप्रैल 1994 से डेलीवेजर थीं और 2001 से नियमित हुईं। 2017 में उन्हें डाक रनर के रूप में पुष्टि की गई थी और वह नियमित हेल्पर्स में सबसे वरिष्ठ थीं। उन्होंने 31 वर्षों की सेवा के बाद पदोन्नति की मांग की, क्योंकि वह 2006 से जमादार और 2012 से ऑफिस असिस्टेंट के लिए पात्र थीं, लेकिन उन्हें पदोन्नत नहीं किया गया।
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न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि याचिकाकर्ता ने 2022 की योजना के आधार पर दावा किया, जबकि 1994 के नियमों के तहत लंबित मामलों को उसी के अनुसार तय किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता ने 2022 की योजना के क्लॉज 18 के प्रावधान को छिपाया, जिसके लिए उन पर जुर्माना लगाया गया। कोर्ट ने माना कि रेस्पॉन्डेंट नंबर 3 की नियुक्ति 1994 के नियमों के तहत वैध है और इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। याचिका को निराधार करार देते हुए खारिज कर दिया गया और याचिकाकर्ता को 50,000 रुपये एडवोकेट्स वेलफेयर फंड में जमा करने का निर्देश दिया गया। ब्यूरो
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याचिकाकर्ता ने 17 अक्टूबर 2024 के आदेश संख्या 84-एसकेआईसीसी को चुनौती दी थी, जिसमें जी नाथ राशिद को एसकेआईसीसी में ऑफिस असिस्टेंट/टाइपिस्ट के रूप में अस्थायी नियुक्ति दी गई थी, जिसे 1994 के एसआरओ 43 के तहत स्वीकृत किया गया था। याचिकाकर्ता ने इस आदेश को रद्द करने की मांग की थी।
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मुमतजा अख्तर 1 अप्रैल 1994 से डेलीवेजर थीं और 2001 से नियमित हुईं। 2017 में उन्हें डाक रनर के रूप में पुष्टि की गई थी और वह नियमित हेल्पर्स में सबसे वरिष्ठ थीं। उन्होंने 31 वर्षों की सेवा के बाद पदोन्नति की मांग की, क्योंकि वह 2006 से जमादार और 2012 से ऑफिस असिस्टेंट के लिए पात्र थीं, लेकिन उन्हें पदोन्नत नहीं किया गया।
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न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि याचिकाकर्ता ने 2022 की योजना के आधार पर दावा किया, जबकि 1994 के नियमों के तहत लंबित मामलों को उसी के अनुसार तय किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता ने 2022 की योजना के क्लॉज 18 के प्रावधान को छिपाया, जिसके लिए उन पर जुर्माना लगाया गया। कोर्ट ने माना कि रेस्पॉन्डेंट नंबर 3 की नियुक्ति 1994 के नियमों के तहत वैध है और इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। याचिका को निराधार करार देते हुए खारिज कर दिया गया और याचिकाकर्ता को 50,000 रुपये एडवोकेट्स वेलफेयर फंड में जमा करने का निर्देश दिया गया। ब्यूरो