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छर्रों के निशान बताते हैं तबाही का मंजर

Sun, 04 Jan 2015 11:15 PM IST
Updated Sun, 04 Jan 2015 11:15 PM IST
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Pakistan firing kills 3 in J&K, triggers migrations
सीमा से सटे गांवों को मिशन हिफाजत के तहत खाली करवा लिया गया है। इन गांवों में जिस ओर नजर दौड़ाओ, वहां मोर्टार के छर्रों के निशान तबाही का मंजर दर्शाते हैं। भले वह कुल्लियां गांव हो या फिर चक फकीरा, मंगू चंक।
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तमाम गांवों के लोग अपने घर से बाहर होने के बावजूद अपने पशुओं को लेकर चिंतित नजर आए। प्रशासन की ओर से स्कूलों में बनाए गए शिविरों में ग्रामीणों ने रैन बसेरा बना लिया है। गांवों के बच्चे गोलाबारी के भय से दूर स्कूल की छुट्टियां बिताने में मस्त रहे। गांव में वाहनों के आवागमन पर प्रतिबंध है।
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कारण, अंधेरे में वाहनों की लाइटें सीमा पार बैठे दुश्मनों को हमला करने में मददगार न बन जाएं। एक दिन पहले दोबारा फायरिंग हुई थी। गांव के कुछ मकानों में चंद युवक ही थे। युवकों के अनुसार गोलाबारी के भय और गांव खाली होने के कारण रातभर भौंकते कुत्ते अप्रिय घटना का आंदेशा देते रहे। यही हाल सीमावर्ती इलाकों के ज्यादातर गांवों का है।
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शाम ढलते ही पूरा गांव खाली हो जाता है

Pakistan firing kills 3 in J&K, triggers migrations
बैन गलाड़ गांव के लोगों ने पिछले दस दिनों में तीन बार गोलाबारी के घाव पाए हैं। लगभग दो हजार आबादी वाले गांव के ज्यादातर लोग शरणार्थी शिविरों या फिर दूर दराज रहने वाले रिश्तेदारों के घर पनाह लिए हुए हैं। घरों के बाहर बंधे पशु भी भयभीत नजर आए।

उनके शरीर पर छर्रों के निशान और बहता खून उनके बेजुबानी दर्द को दर्शा रहा था। गांव के लगभग छह स्कूल सूने पड़े हैं। कब खुलेंगे, किसी को नहीं पता। शाम ढलते ही पूरा गांव खाली हो जाता है। रविवार की सुबह गोलाबारी नहीं हुई। ग्रामीणों को अपने पशुओं की सबसे ज्यादा चिंता है।

जिन्हें वह भगवान भरोसे घरों के बाहर बांधकर चले आए। इनमें से कई मोर्टार के छर्रों का शिकार हुए। गांव के कुछ युवा और बुजुर्ग लगभग दस बजे के बाद गांव पहुंचे। पशुओं को चारा डालने के बाद जगह-जगह झुंड बनाकर आपस में बातें कर रहे हैं।

साथ ही एक-दूसरे को घरों की आड़ में खड़ा रहने को कह रहे हैं। सीमा पार से कभी भी गोले गिरने की दहशत उनके दिलो-दिमाग पर है। दीपक शर्मा कहते हैं, ‘एक दिन पहले गिरे मोर्टार के गोले को देखने गए दो युवक पीछे से आए अन्य गोले का शिकार हुए है।

इसलिए अकसर डर लगा रहता है कि कहीं कोई गोला न आ गिरे।’ ग्रामीणों की चिंता है कि उन्हें शाम ढलते ही फिर अपने पशुओं और घरों को भगवान भरोसे छोड़कर गांव छोड़ना पड़ेगा।
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