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सरहद की दीवार हैं सीमा से सटे गांव, इन्हें बचाओ

Fri, 29 Aug 2014 01:31 AM IST
Updated Fri, 29 Aug 2014 01:31 AM IST
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pak firing at indian border

सरहद से सटे गांवों में लोगों को अंधेरे से डर लगने लगा है। सूर्य ढलते ही गांवों से समूहों में लोगों का राहत शिविरों की तरफ पलायन शुरू हो जाता है। ये लोग दिन गांवों में तो रात राहत शिविरों में गुजारने को मजबूर हैं। पिछले एक महीने से सीमावर्ती गांवों खासतौर से जीरो लाइन के आसपास बसे लोगों की जिंदगी में ऐसा ही हो रहा है।

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सीमावर्ती गांव चंदूचक्क के निवासी चमन लाल का कहना है कि सीमावर्ती गांव सरहद की दीवार हैं। देश की सरकार को इसे गिरने नहीं देना चाहिए। उनका कहना है कि पिछले एक महीने से पाकिस्तान की हिमाकत की वजह से सरहद के गांवों में अफरातफरी का माहौल है।
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सरकार को सरहदी गांवों के लोगों की सुरक्षा के ठोस नीति तैयार करनी चाहिए। सुरक्षित स्थानों पर उन्हें पांच-पांच मरले के प्लाट दिए जाने चाहिए ताकि गोलाबारी की स्थिति में परिवार वहां शिफ्ट हो सकें। उनका कहना है कि राहत शिविर गांवों से आठ से दस किलोमीटर की दूरी पर है।
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ग्रामीणों ने कहा, सरकार को इसे गिरने नहीं देना चाहिए

pak firing at indian border

परिवहन की सुविधा भी नहीं है। लोगों के लिए राहत शिविरों तक पहुंचना चुनौती से कम नहीं है। 75 वर्षीय हरबंस कौर का कहना है कि अंधेरा होते ही गांव में गोलाबारी शुरू कर देने की वजह से पशुओं और चंद बुजुर्गों लोगों के अलावा वहां कोई नहीं रह जाता है।

इसलिए वह परिवार के साथ आईटीआई कालेज आरएस पुरा में बने राहत शिविर में चले जाते हैं। सुबह फिर गांवों में आना शुरू होता है। न तो नींद पूरी हो पा रही है और न ही खेती कर पा रहे हैं। ऐसे में करें तो क्या करें।

मंजीत और गुरनाम सिंह का कहना है कि सीमांत ग्रामीण पलायन करना नहीं चाहते। सरकार को चाहिए कि वह ठोस नीति बनाकर काम करें। वहीं गवर्नमेंट हाई स्कूल चंदूचक्क के नौवीं कक्षा के छात्र अमित चौधरी का कहना है कि सीजफायर के उल्लंघन के बाद से ही स्कूल बंद है। ऐसे में उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है।

दुधारू मवेशियों को कहां छोड़ें

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ज्योड़ा फार्म में गुज्जर परिवार इन दिनों मुश्किल भरे हालात से गुजर रहा है। पाकिस्तानी गोलाबारी से दो लोगों की अब तक मौत हो चुकी है और करीब तीन लोग अस्पताल में भर्ती है। ज्योड़ा फार्म निवासी जमात अली का कहना है कि यहां पर ज्यादातर परिवार दुधारू पशुओं पर निर्भर हैं।

दूध बेचकर गुजारा चलता है। बाना सिंह स्टेडियम आरएस पुरा में राहत शिविर बनाया हुआ है। वह यहां से कई किलोमीटर दूर है। परिवहन की सुविधा नहीं होने की वजह से वहां जाने में दिक्कत होती है। जान के खतरे को देखकर जाना भी पड़ता है और दुधारू मवेशी यहीं पर रह जाते हैं।

गफूर अहमद और मुराद अली का कहना है कि राहत शिविर में रात गुजारने के बाद सुबह पहुंचने में देरी होती है और उनका काम बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है। सरकार को कम से कम परिवहन सुविधा उपलब्ध करवानी चाहिए ताकि लोग समय पर पहुंचकर अपनी आजीविका कमा सकें।

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