सन्नाटे के बीच गूंजी कश्मीर की जयकार
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सड़कों पर सन्नाटा। अघोषित कर्फ्यू जैसा। शांति के प्रतीक कबूतरों को खुलकर बिचरने का मौका श्रीनगर में अक्सर मिल जाता है। कभी अलगाववादियों की हड़ताल और कभी आतंकवादियों की गरजती बंदूकें आम आदमी को घरों में दुबकने को मजबूर कर देती है और सड़कों के किनारे खड़ी अट्टलिकाओं की छतें शांति के प्रतीक कबूतरों का बसेरा बन जाती हैं।
रविवार की रात से ही श्रीनगर आने वाली सड़कों को सील कर दिया गया था। पंथा चौक से ही हर वाहन को हाईवे की ओर मोड़ दिया गया। अलगाववादियों के बंद और आतंकवादियों के हमले के दौरान हर बार श्रीनगर तलाशी के लिए मजबूर होता रहा है लेकिन पहली बार सीलबंदी ऐसी की गई कि लोग रविवार की शाम छह बजे के बाद शहर में दाखिल होने को तरस गए।
पंथा चौक से डल गेट तक एक दर्जन चेकपोस्ट बने। हर शख्श का स्कैन हो रहा था। तीन दिन पहले पाकिस्तानी आतंकवादियों ने उड़ी कैंप पर फिदायीन हमला किया और रैली के एक दिन पहले पुलवामा में सीआरपीएफ कैंप पर हमला हुआ।
आतंकवादी अपनी खीज उतार रहे थे। प्रधानमंत्री की रैली इन तमाम चुनौतियों को धता बताते हुए पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार करने के लिए पूरे श्रीनगर को फैजी छावनी में बदल दिया गया।
कच्छ और कश्मीर की तुलना
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद को कश्मीरियों का असली हमदर्द बताने के क्रम में कश्मीरी लिबास अपना लिया। जम्मू संभाग की सबा में डोगरी पगड़ी पहने मोदी एक घंटे बाद जाब श्रीनगर के शेरे कश्मीर स्टेडियम पहुंचे तो बिल्कुल बदले लिबास में थे। उन्होंने फिरन पहन रखी थी जो आम कश्मीरियों का पारंपरिक लिबास है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के कच्छ से कश्मीर की तुलना की। समानता यह कि कच्छ भी पाकिस्तान की सीमा पर है और गुजरात का वह जिला भी मुस्तिम बहुल है। मोदी ने कहा कि जब कच्छ का विकास हो सकता है तो कश्मीर का क्यों नहीं।
मोदी ने कहा कि वह कच्छ में भी पाकिस्तान पर बोलने के बजाए सिर्फ विकास की बात करते रहे और अब उन्होंने वही नीति कश्मीर में अपना ली है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कश्मीरियों का दिल जीतने के लिए हर नुस्खा अजामाया।