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जब शहीद अपनों को याद कर फूट-फूटकर रोए परिजन

Wed, 22 Oct 2014 12:50 AM IST
Updated Wed, 22 Oct 2014 12:50 AM IST
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national police day in jammu

...याद उन्हें भी कर लो, जो लौट के घर न आए...। पुलिस बैंड पर यह धुन उन शहीदों की याद ताजा कर रही थी, जिन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए कर्त्तव्य का पालन किया। यह माहौल था पुलिस हेडक्वार्टर के गुलशन ग्राउंड का, जहां नेशनल पुलिस डे के मौके पर शहीदों को याद कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई।

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इस मौके पर जहां पुलिस अफसरों, रिटायर्ड पुलिस कर्मियों और शहीद परिवार के सदस्यों ने पुष्पांजलि अर्पित की, वहीं आईजीपी जम्मू राजेश कुमार ने पुलिस बैंड की धुन पर परेड की सलामी ली। इसके अलावा रेल हेड कांप्लेक्स स्थित शहीद समागम में भी आईजी और अन्य पुलिस अफसरों ने श्रद्धांजलि दी।
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आईजीपी राजेश कुमार ने छह सौ शहीदों के नाम पढ़ते हुए कहा कि देश की एकता और अखंडता के लिए उन्होंने जो कुर्बानी दी, उसे कभी भूला नहीं जा सकता। उन्होंने शहीद परिवारों को भरोसा दिया कि उनकी हर समस्या के समय पुलिस महकमा उनके साथ खड़ा है।
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अन्य सुरक्षाबलों के शहीद भी किए गए याद

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साथ ही शहीद पुलिस कर्मियों के सम्मान में किसी तरह की कमी नहीं आने दी जाएगी। इस मौके पर पुलिस के शहीदों के अलावा बीएसएफ, सीआरपीएफ, आईटीबीपी, सीआईएसएफ, एसएसबी, एनएसजी के जवानों को याद किया गया, जिन्होंने आतंकियों से लोहा लेते हुए अपनी जान देश के नाम कर दी।

शुरूआत में 1959 में सीआरपीएफ के छोटे से ग्रुप ने लेह में चीनी सैनिकों से लोहा लेते हुए कुर्बानी दी थी। उसके बाद शहीदों की सूची बढ़ती चली गई। इस मौके पर डीआईजी जम्मू, डीआईजी आर्म्ड, डीआईजी आईआर, एसएसपी जम्मू और अन्य पुलिस अधिकारी उपस्थित थे।

शहीदों की याद में रक्तदान शिविर का भी आयोजन किया गया। शाम को एक अन्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें पुलिसकर्मियों और शहीद परिवारों ने मोमबत्ती जलाकर शहीदों को याद किया गया।

दिल का दर्द आंसुओं में नजर आया

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अपनों को खोने का गम क्या होता है, यह मंगलवार को पुलिस हेडक्वार्टर में नजर आया, जहां शहीद परिवारों के दिल का दर्द उनके आंसुओं में नजर आया। किसी शहीद के पिता को अपने बेटे के खोने का गम था तो किसी विधवा को अपने पति के वापस न लौटने का।

बुजुर्ग गुरदेव राम जब श्रद्धांजलि स्थल पर फूल चढ़ाने गए तो उनके हाथ कांप रहे थे। उस जांबाज बेटे शिवनाथ (हवलदार, आईआरपी) की याद ताजा हो गई, जो 27 दिसंबर 1999 को श्रीनगर में आतंकियों से लोहा लेते हुए शहीद हो गया था।

उनका कहना है कि बेटे के शहीद होने के बाद पुलिस विभाग के अफसर उनके घर पहुंचे और उनकी हर तरह से मदद की। कुछ ऐसा ही हाल ज्योति कोहली का है, जिसने 30 मार्च, 2002 को रघुनाथ मंदिर में हुए आतंकी हमले में अपने पति धीरज कोहली को खो दिया था।

पति के बाद बेटा भी हुआ शहीद

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तब उनका बेटा चाहत मात्र पांच माह का था। घर की जिम्मेदारी ज्योति पर आ गई। पुलिस विभाग ने मदद की। नौकरी भी दी। अब उनका बेटा 12 साल का हो गया है। उसे भी अहसास हो चुका है कि उसका पिता आतंकियों का सामना करते हुए शहादत का जाम पी गया।

ज्योति का सपना है कि उनका बेटा बड़ा होकर अपने पिता के आदर्शों पर आगे बढ़े। एक अन्य महिला नीलम खजूरिया को दोहरा गम मिला। पहले पति को खोया और उसके बाद जवान बेटा गंवाया। नीलम खजूरिया के पति एएसआई कृष्ण लाल खजूरिया 2001 में शहीद हुए थे।

पति के बाद बेटे को पुलिस में सब इंस्पेक्टर की नौकरी मिली। परिवार संभला, लेकिन एक दिन अचानक रहस्यमय परिस्थितियों में बेटा भी छोड़कर चला गया। नीलम ने बताया कि उन्हें जीपी फंड मिलने में थोड़ी समस्या आ रही है। आईजी से बातचीत की है और उन्होंने आश्वासन भी दिया है।

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