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नेकां व पीडीपी संविधान संशोधन के निर्णय से नाखुश, फैसले के खिलाफ अदालत का रुख करने पर कर रहे विचार
Sat, 02 Mar 2019 12:02 AM IST
Pranjal Dixit
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
Published by: Pranjal Dixit
Updated Sat, 02 Mar 2019 12:02 AM IST
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Omar Abdullah and Mehbooba Mufti
- फोटो : फाइल
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नेकां और पीडीपी ने कहा कि वे रियासत में किसी निर्वाचित सरकार के अभाव में संविधान के 77 वें और 103 वें संशोधन को राज्य में लागू करने के केंद्र के निर्णय के खिलाफ अदालत का रुख करने पर विचार कर रहे हैं। दोनों पार्टियों ने यह प्रतिक्रिया उस वक्त जाहिर की, जब केंद्र सरकार ने वीरवार को उस अध्यादेश को मंजूरी दी, जिसके तहत राज्य में अनुसूचित जाति और जनजातियों को आरक्षण का लाभ दिए जाने का प्रावधान है।
बता दें कि राज्य को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के एक प्रावधान में संशोधन कर यह व्यवस्था की गई। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि इससे राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 370 के अंतर्गत जम्मू और कश्मीर में लागू होने के लिए संशोधन आदेश 2019 द्वारा 77 वां संशोधन अधिनियम 1955 और 103वां संशोधन अधिनियम 2019 से संशोधित भारत के संविधान के प्रासंगिक प्रावधान लागू होंगे।
नेकां नेता उमर अब्दुल्ला ने कहा कि अनुच्छेद 370 यह प्रावधान करता है कि तीन विषयों के तहत नहीं आने वाले किसी संवैधानिक प्रावधान को राज्य में लागू करने के लिए सरकार की सहमति जरूरी है। उनकी पार्टी वरिष्ठ वकीलों से चर्चा कर देखेगी कि इस फैसले को अदालत में कैसे चुनौती दी जा सकती है।
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उमर ने ट्वीट किया, सरकार का मतलब होता है निर्वाचित सरकार। राष्ट्रपति राज्यपाल की सहमति नहीं मांग सकते। क्योंकि वह राष्ट्रपति के प्रतिनिधि या एजेंट होते हैं। यह वहां भी लागू होता है जहां सिर्फ सहमति की जरूरत होती है। यही वजह है कि नेकां शनिवार को वरिष्ठ वकीलों से संपर्क करेगी ताकि देखा जा सके कि हम इस असंवैधानिक आदेश को अदालत में चुनौती देने के लिए कौन सा कदम उठा सकते हैं।
पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने कहा कि स्पष्ट तौर पर राज्यपाल के पद का इस्तेमाल करना राज्य को कमजोर करने का एक दुर्भावनापूर्ण कदम प्रतीत होता है। इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और पूरा राज्य भारत सरकार के इस कदम के खिलाफ लड़ाई लड़ेगा। उन्होंने केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए पूछा कि कश्मीर के लोगों को मजबूर क्यों किया जा रहा है।
महबूबा ने ट्वीट में कहा, भारत सरकार आग में घी डालने और हालात को काबू से बाहर जाने देने पर क्यों तुली है। कश्मीरियों को मजबूर क्यों किया जा रहा है। पीडीपी इस लड़ाई को अदालत में पूरी मजबूती से लड़ने के लिए समान विचारधारा वाली पार्टियों के साथ काम करने के लिए तैयार है।
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बता दें कि राज्य को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के एक प्रावधान में संशोधन कर यह व्यवस्था की गई। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि इससे राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 370 के अंतर्गत जम्मू और कश्मीर में लागू होने के लिए संशोधन आदेश 2019 द्वारा 77 वां संशोधन अधिनियम 1955 और 103वां संशोधन अधिनियम 2019 से संशोधित भारत के संविधान के प्रासंगिक प्रावधान लागू होंगे।
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नेकां नेता उमर अब्दुल्ला ने कहा कि अनुच्छेद 370 यह प्रावधान करता है कि तीन विषयों के तहत नहीं आने वाले किसी संवैधानिक प्रावधान को राज्य में लागू करने के लिए सरकार की सहमति जरूरी है। उनकी पार्टी वरिष्ठ वकीलों से चर्चा कर देखेगी कि इस फैसले को अदालत में कैसे चुनौती दी जा सकती है।
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उमर ने ट्वीट किया, सरकार का मतलब होता है निर्वाचित सरकार। राष्ट्रपति राज्यपाल की सहमति नहीं मांग सकते। क्योंकि वह राष्ट्रपति के प्रतिनिधि या एजेंट होते हैं। यह वहां भी लागू होता है जहां सिर्फ सहमति की जरूरत होती है। यही वजह है कि नेकां शनिवार को वरिष्ठ वकीलों से संपर्क करेगी ताकि देखा जा सके कि हम इस असंवैधानिक आदेश को अदालत में चुनौती देने के लिए कौन सा कदम उठा सकते हैं।
पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने कहा कि स्पष्ट तौर पर राज्यपाल के पद का इस्तेमाल करना राज्य को कमजोर करने का एक दुर्भावनापूर्ण कदम प्रतीत होता है। इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और पूरा राज्य भारत सरकार के इस कदम के खिलाफ लड़ाई लड़ेगा। उन्होंने केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए पूछा कि कश्मीर के लोगों को मजबूर क्यों किया जा रहा है।
महबूबा ने ट्वीट में कहा, भारत सरकार आग में घी डालने और हालात को काबू से बाहर जाने देने पर क्यों तुली है। कश्मीरियों को मजबूर क्यों किया जा रहा है। पीडीपी इस लड़ाई को अदालत में पूरी मजबूती से लड़ने के लिए समान विचारधारा वाली पार्टियों के साथ काम करने के लिए तैयार है।