भागवत ने अनुच्छेद 370 के औचित्य पर उठाए सवाल
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जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन सरकार चला रही भाजपा ने भले ही अनुच्छेद 370 के मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया हो, लेकिन, यह मसला अब भी संघ के एजेंडे में सबसे ऊपर है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत ने संकेतों में अनुच्छेद 370 के औचित्य पर सवाल उठाए।
स्वयं सेवकों का गणवेश बदले जाने के बाद जम्मू में पहली बार नए पूर्ण गणवेशधारी स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए भागवत ने अलगाववादियों की पाकिस्तान भक्ति के लिए उन पर प्रहार किए। समस्या उलझाए रखने के लिए कांग्रेस की पूर्व सरकारों को भी आड़े हाथ लिया। भागवत ने कहा कि देश विविधता भरा है। अलग-अलग राज्यों में भिन्न परिस्थितियों के कारण अलग-अलग कानून रहे।
अलग-अलग राजा भी रहे लेकिन कोई प्रावधान और व्यवस्था देश की संप्रभुता से ऊपर नहीं हो सकती। संविधान की प्रस्तावना भावात्मक एकता की बात करती है। सरकारें, शासन और प्रशासन को इस भावना के पोषक की भूमिका निभानी होगी। भावनात्मक एकता को तोड़ने वाले तत्व बर्दाश्त योग्य नहीं होते। उन्होंने मिलजुल कर आक्रांताओं पर विजय हासिल करने का मंत्र दिया।
देशभक्ति के लिए कानून बनाने की जरूरत
संघ प्रमुख ने इशारों में कश्मीर समस्या के लिए कांग्रेस की पूर्व सरकारों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि यह नहीं हो सकता कि हम भी रहें और समस्या भी रहे। यह स्थिति समाधान में कोशिश की कमी को दर्शाती है। कानून और संविधान समस्या के समाधान में सहायक की भूमिका में होते हैं।
निहितार्थ यह कि इनको आधार बनाकर समस्या उलझाने की कोशिश गलत है। भागवत ने साफ किया कि देशभक्ति के लिए कानून बनाने की जरूरत नहीं है। कश्मीर मसले में पाकिस्तान के दखल पर उन्होंने कहा कि एक विदेशी आक्रांता को खदेड़ें तो दूसरा आ जाता है। इतिहास के इस चक्र को पलटना चाहते हैं तो देश के लिए जीने-मरने पर उतारू रहना पड़ेगा।
देश को काटकर बांट खाने की मानसिकता बदलनी होगी। उन्होंने दुनिया भर में फैल रही कट्टर सांप्रदायिकता पर भी चोट की। भागवत ने कश्मीर को भारतीय संस्कृति की भावनात्मक एकता से जुड़ने की नसीहत दी। भाषा, व्यवस्था और पूजा पद्धति किसी को नहीं जोड़ती बल्कि भाव जोड़ता है।