आंखों में छलक रहा अपनों से जुदाई का गम
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मेरी बहन श्रीनगर गई थी। शनिवार के बाद उससे कोई संपर्क नहीं हुआ। उसका एक छोटा बच्चा है और वह खुद भी बीमार है। कोई उससे फोन पर ही बात करवा दो। बड़ी मेहरबानी होगी। फफकती हुई महिला का दर्द छलक उठा। सड़क किनारे छोटा-मोटा व्यवसाय चलाकर आजीविका कमाने वाले गुजरात से आए लोगों के समूह में शामिल हर सदस्य की कहानी कमोबेश एक जैसी है।
कठुआ के महात्मा गांधी जच्चा-बच्चा अस्पताल के बाहर फड़ी लगाकर गुजारा कर रहे लोगों के अधिकांश रिश्तेदार श्रीनगर में फंसे हुए हैं। उन्होंने बताया कि पचास के करीब लोग श्रीनगर में छिटपुट कारोबार कर रहे थे। उनमें किसी की बहन है किसी का भाई। कई रिश्तेदारों के साथ तो दुधमुंहे बच्चे और किशोर भी हैं। उनके साथ किसी का संपर्क तक नहीं हो रहा।
'उनकी जान-पहचान भी नहीं है'
अप्रवासी होने की वजह से उनकी जान-पहचान भी नहीं है। ऐसे में बाढ़ से घिरे हालात में उनकी सुध लेने की जानकारी तक नहीं मिल रही है। इस बीच कठुआ से श्रीनगर खेल आयोजन के लिए रवाना हुए 31 स्कूली बच्चों के परिजनों का भी बुरा हाल है।
पिछले कई दिनों से परिजन जहां प्रशासन की चौखट खटखटा रहे हैं वहीं जम्मू एयरपोर्ट पर कई दफा चक्कर लगाने के बावजूद उन्हें बैरंग लौटना पड़ा है। परिजनों के अनुसार प्रशासन ने उन्हें दो दफा बच्चों को सुरक्षित जम्मू पहुंचाने का वादा किया लेकिन अभी तक कुछ ठोस नहीं हो पाया है।
काउंसिलिंग के लिए गए 25 युवा भी फंसे
उधर महानपुर से श्रीनगर में इंजीनियरिंग की काउंसलिंग के लिए गए करीब पच्चीस युवाओं के लिए कसबे में चिंता बढ़ गई है। स्थानीय सरपंच सुरजीत सिंह, राज सिंह, राजिंदर सिंह ने बताया कि महानपुर कसबे से पच्चीस बच्चे काउंसलिंग के लिए श्रीनगर गए थे।
बाढ़ में फंसे होने की वजह से उन्हें अभी तक वापस नहीं लाया गया है। पंचायत प्रतिनिधियों ने बताया कि बच्चों को एयरपोर्ट तक पहुंचाए जाने की खबर है, लेकिन इसके बावजूद भी उन्हें जम्मू नहीं पहुंचाया गया है। ऐसे में उनके परिवार वाले बेहाल हैं।