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जानिए, अपने मुल्क में शरणार्थी बने 12 लाख लोगों का दर्द

Wed, 27 Aug 2014 01:10 AM IST
Updated Wed, 27 Aug 2014 01:10 AM IST
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Know the pain of the displaced

कश्मीर से विस्थापित हुए लगभग दो लाख पंडितों के लिए केंद्र सरकार ने कई योजनाएं चलाईं। इन योजनाओं पर अब तक लगभग 39 हजार करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। लेकिन पाक अधिकृत कश्मीर से विस्थापित हुए 12 लाख लोगों के लिए अबतक कोई विशेष योजना नहीं बन सकी।

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केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार का भी अबतक कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास पर ही जोर है। करोटोना नई बस्ती के रतन लाल कहते हैं कि भारत सरकार के तहत अबतक पीओके को पाकिस्तान नहीं माना जाता है, वह कश्मीर का ही हिस्सा है।
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जम्मू कश्मीर विधानसभा में 25 सीटें पीओके के लिए सुरक्षित हैं जो खाली रहती हैं।  पीओके से विस्थापित हुए लोगों को केंद्र सरकार तकनीकी रूप से शरणार्थी नहीं मानती इसलिए उन्हें शरणार्थियों की भी सुविधाएं नहीं मिलीं।
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हर साल देखते हैं बर्बादी का ये मंजर

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पश्चिमी पाकिस्तान से विस्थापित हुए लोगों को नागरिकता भी नहीं मिली। उन्हें रियासत सरकार में नौकरी के लिए आवेदन का भी अधिकार नहीं है। रंगपुर के रुदू राम स्लैड के शरणार्थी शिविर में ठहराए गए हैं।

उनका कहना है कि फसलें बरबाद हो रही हैं। पाक गोलाबारी के कारण घर छोड़ना पड़ा अब खेतों में न तो सिंचाई हो पा रही है और न ही मवेशियों को चारा देना संभव है। हर साल ऐसे हालात पैदा हो जाते हैं।

न तो समय पर धान लगा पाते हैं और फसल लगी तो उसे काटना मुश्किल हो जाता है। रंगपुर में पाक गोलाबारी से चार गायें मारी गईं हैं। गायों का दूध बेचकर गुजारा करने वाले इन परिवारों की रोजी-रोटी छिन गई है। चंदूचक की चन्नो देवी और सीता देवी को अब सरकार पर भी भरोसा नहीं रहा। वह कहती हैं कि हर बार वादे होते हैं लेकिन उनके लिए हालात नहीं बदलते।

68 साल से बंधे हैं बार्डर विस्थापितों के बिस्तर

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विधिपुर के अस्सी वर्षीय हजूर सिंह को इस बात का मलाल है कि आजादी के बाद सरकारें बदलती रहीं लेकिन उनका समस्याएं जस की तस हैं। आरएस पुरा के शरणार्थी शिविर में पनाह लेने को मजबूर हुई इस बुजुर्ग की व्यथा है कि 68 साल से उनके बिस्तर बंधे हैं।

1947 में शरणार्थी बनकर आए तो सबकुछ लुट चुका था। रहने का ठौर तो मिला, लेकिन चैन अब भी नहीं है। पाकिस्तान की गोलाबारी उन्हें बार-बार  शरणार्थी शिविर तक में पनाह लेने की मजबूर कर देती है।

यह दर्द अकेले हजूर सिंह का नहीं है। बार्डर पर बसे गांवों के लोग हर बार पाकिस्तान के गोले झेलते हैं। 1947, 1965 और बाद में 1971 में विस्थापित हुए लोग अब भी अपने ही देश में शरणार्थी हैं।

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