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जानिए, कश्मीरी पंडितों को क्या याद आ रहा
ब्यूरो/अमरउजाला, जम्मू
Updated Mon, 02 Nov 2015 07:29 PM IST
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जब भी दिवाली का त्योहार आता है तो विस्थापित कश्मीरी पंडितों को कश्मीर में मनाई दिवाली याद आ जाती है। तब वहां घरों में हवन, यज्ञ होते थे, नदियों के किनारे पर दीपक जलाए जाते थे और शाम को हिंदू-मुस्लिम एक-दूसरे को बधाई देते थे।
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कश्मीर की वादियों में मनाई दिवाली की यादें आज भी ताजा हैं। यह कहना है कि जगती टाउन में रहने वाले कश्मीरी पंडितों का, जो अब क्वार्टरों में रहकर दिवाली मनाने को मजबूर हैं।
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कश्मीरी पंडित 26 वर्ष से दिवाली का त्योहार किराए के कमरों और क्वार्टरों में मना रहे हैं। हर साल इनको अपने घर में मनाई गई दिवाली याद आती है। सुनील पंडिता ने बताया कि दिवाली पर घर में विशेष तौर पर हवन यज्ञ किया जाता है।
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शाम को पूरा परिवार पूजन करता है और फिर धूमधाम से दीवाली मनाई जाती है, लेकिन जब से विस्थापित हुए हैं तब पहले जैसी उमंग महसूस नहीं होती। कश्मीर में मनाई गई दिवाली याद आती है।
सुबह से ही मुस्लिम समुदाय के लोग भी बधाइयां देना शुरू कर देते थे और शाम को उनके साथ दिवाली मनाते थे। सुनील रैना ने कहा कि दिवाली कश्मीरी पंडितों के लिए बहुत ज्यादा महत्व रखती है।
इस दिन विशेष तौर पर सरस्वती मां का पूजन करते हैं। कश्मीर में अपने परिवार के साथ मनाई दिवाली आज भी उनके जहन में है।
टीके भट ने कहा कि कश्मीर में दीवाली पर घर में तो दीपक जलाते ही थे, साथ ही नदियों और प्राकृतिक जल स्रोतों पर भी दीपक जलाते थे।
अब वह दिन दोबारा आएंगे कि नहीं पता नहीं। राजकुमार थुसू ने बताया कि सबके लिए अपना घर अजीज होता है। दिवाली का त्योहार का असली आनंद तो अपने घर में ही है।