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Jammu Kashmir: अब बंद कमरों में महक रहा कश्मीर का 'लाल सोना', नई तकनीक से बढ़ा केसर उत्पादन

Sat, 13 Jun 2026 12:32 PM IST
Nikita Gupta एचपी चौहान अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
एचपी चौहान अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू Published by: Nikita Gupta Updated Sat, 13 Jun 2026 12:32 PM IST
सार

कश्मीर में जलवायु परिवर्तन और सीमित कृषि भूमि की चुनौती से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने हाइड्रोपोनिक और एयरोपोनिक तकनीक आधारित इनडोर केसर उत्पादन शुरू किया है। इस नई तकनीक से पारंपरिक खेती की तुलना में केसर की पैदावार लगभग दोगुनी हो गई है और किसानों को कम जमीन पर अधिक उत्पादन मिल रहा है।

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Kashmir's saffron is now blooming in the dark.
चरार-ए-शरीफ में कमरे में केसर की खेती करते किसान अली मोहम्मद। - फोटो : नाबार्ड

विस्तार

विश्व के सर्वाधिक सुगंधित और सर्वोत्तम केसर का जिक्र आते ही आंखों के सामने कश्मीर की तस्वीर उभर आती है। बदलते मौसम और जलवायु परिवर्तन के बीच कश्मीर का यह ‘लाल सोना’ यानी केसर अब बंद कमरों में भी महकने लगा है। उन्नत तकनीक व नियंत्रित वातावरण से किसान अब खेतों की तुलना में बंद कमरों में कहीं अधिक और उच्च गुणवत्ता वाला केसर उगा रहे हैं।

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देश की औसतन जोत का आकार 1.08 हेक्टेयर है, लेकिन जम्मू-कश्मीर में कृषि जोत का यह आकार मात्र 0.59 हेक्टेयर ही है। कुछ किसानों के पास तो मात्र 0.33 हेक्टेयर जमीन है। ऐसे में नाबार्ड और कृषि वैज्ञानिकों ने संयुक्त प्रयास से कम जमीन पर अधिक उत्पादन के लिए नई तकनीक खोजी। नाबार्ड के वित्तीय सहयोग से शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (स्कॉस्ट) कश्मीर ने 2021-22 में ‘इनडोर केसर उत्पादन - केसर के विस्तार के लिए एक नवीन तकनीक’ परियोजना शुरू की।
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हाइड्रोपोनिक व एयरोपोनिक जैसी उन्नत इनडोर तकनीकों को अपनाया गया। परिणाम सुखद रहा। पारंपरिक तरीके से जिस दो क्विंटल कंद से 170 ग्राम केसर मिलता था, वह बंद कमरे में 325 ग्राम तक पहुंच गया है।

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जून में बंद कमरे में रखने के बाद नवंबर में खिले फूल
तकनीक के अंतर्गत जून माह में कंदों को खेत से निकालकर लगभग 90 दिनों तक अंधकारयुक्त बंद कमरे में उच्च घनत्व पर रखा जाता है। नियंत्रित तापमान (दिन में 20–230C तथा रात में 10–120C), आर्द्रता और प्रकाश से अक्तूबर के अंतिम सप्ताह से नवंबर के प्रारंभ तक फूल प्राप्त होते हैं। फूलों की तुड़ाई के बाद कंदों की छंटाई कर शीर्ष कली को पुनः रोपण के लिए सुरक्षित रखा जाता है।

दो क्विंटल कंद से खेत में 170 ग्राम और बंद कमरे में 325 ग्राम उत्पादन
इस तकनीक से सबसे पहले लाभान्वित होने वाले बडगाम जिले के चरार-ए-शरीफ के किसान अली मोहम्मद बताते हैं कि 2021-22 में उन्होंने अपने घर में 12×10 वर्गफुट के कमरे में सीमित संसाधनों के बावजूद 2 क्विंटल कंदों से लगभग 305 ग्राम उत्पादन प्राप्त हुआ, जो पारंपरिक खेती की तुलना में लगभग दोगुना था। गुणवत्ता भी बेहतर रही। खुले में उत्पादन की मात्रा 150 से 170 ग्राम के भीतर रहती थी। 2022-23 में पुनः इनडोर केसर उत्पादन चक्र अपनाया। उत्पादन बढ़कर 325 ग्राम हो गया। 2023-24 में 315 ग्राम केसर प्राप्त हुआ।

पुलवामा व बडगाम में पांच जगहों पर शुरू हुआ था पायलट प्रोजेक्ट
नाबार्ड और स्कॉस्ट के सहयोग से संचालित ‘इनडोर केसर उत्पादन - केसर के विस्तार के लिए नवीन तकनीक’ योजना के तहत पुलवामा व बडगाम जिले में पायलट प्रोजेक्ट के तहत चरार-ए-शरीफ, लाडो, डुस्सो पांपोर और लेथपोरा समेत पांच जगहों पर काम शुरू हुआ। नाबार्ड के डीडीएम जुनैद हाकिम और स्कॉस्ट के अधिकारियों ने सर्वेक्षण में पांचों जगह के लिए पांच किसान चुने जिन्हें नाबार्ड से उपकरण खरीदने व तकनीकी सहायता के लिए एक-एक लाख रुपये अनुदान दिया गया। प्रशिक्षण से कंद प्रबंधन, फसल देखरेख व उन्नत कृषि तकनीकों का व्यावहारिक ज्ञान प्रदान किया गया।

शुरूआत में पायलट प्रोजेक्ट के तहत बडगाम और पुलवामा जिले में पांच जगहों पर पांच किसानों को प्रशिक्षण एवं प्रयोग के तौर पर चुना गया था। परिणाम उत्साहजनक रहा। बंद कमरे में हाइड्रोपोनिक और एयरोपोनिक तकनीक से उत्पादन 325 ग्राम तक पहुंच गया। क्रोसिन (रंग) और सैफरानल (सुगंध) की गुणवत्ता भी पारंपरिक रूप से उगाई गई केसर की अपेक्षा उत्तम है। अब तक 100 किसानों को प्रशिक्षित किया जा चुका है। जल्द ही इस तकनीक को प्रदेश सरकार को सौंप दिया जाएगा। अब वह इसको विस्तार देगी। -उर्मिल लता, डीजीएम नाबार्ड जम्मू-कश्मीर, लद्दाख

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