कारगिल युद्धः पाकिस्तान को पस्त कर देने वाले रणबांकुरों की शौर्यगाथा
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कारगिल युद्ध के 21 वर्ष पूरे होने पर वीरों और उनके सर्वोच्च बलिदान को याद करते हुए अमर उजाला उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा है। इस कड़ी में 6 से 8 जुलाई 1999 के दौरान सेना ने कैसे पूरे ऑपरेशन को अंजाम दिया, इसकी जानकारी उस अभियान में शामिल सूबेदार मेजर कौशल कुमार शर्मा, सेना मेडल विजेता (रिटायर्ड) खुद बता रहे हैं।
लगभग 60 दिनों तक चले कारगिल युद्ध के दौरान 3 मई से लेकर 8 जुलाई तक मश्कोह घाटी की सभी पोस्टें हासिल कर ली गईं थीं। इनमें सामरिक महत्व की प्रमुख पोस्टों में प्वाइंट 4590, 5353, 5140, 4875 और टाइगर हिल शामिल थी।
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उधमपुर जिले के रामनगर तहसील के अमरोह गांव निवासी सूबेदार मेजर कौशल कुमार शर्मा, सेना मेडल विजेता (रिटायर्ड) कहते हैं कि युद्ध के दौरान मैं लांस नायक के पद पर 13 जम्मू-कश्मीर रायफल्स में तैनात था और हमारे सीओ, लेफ्टिनेंट कर्नल वाई के जोशी (वर्तमान में लेफ्टिनेंट जनरल, आर्मी कमांडर, उत्तरी कमान) के साथ फोगाट मिसाइल लांच दल में बेस कैंप में थे।
बाद में कैप्टन विक्रम बत्रा के दल के साथ बतौर स्नाइपर शूटर शामिल हो गए। उन्हें इसी ऑपरेशन में बेहतर प्रदर्शन पर सेना मेडल से नवाजा गया। जब विक्रम बत्रा की कंपनी ने प्वाइंट 5140 पर जीत हासिल की, तब भी वे वहां मिसाइल दल में मौजूद थे।
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6 से 8 जुलाई के बीच वो दिन पलटन के लिए रोंगटे खडे़ कर देने वाले अनुभव से भरे हुए थे। कैप्टन विक्रम बत्रा के नेतृत्व में बिना आराम किए दिन रात जूझने के बाद हमें प्वाइंट 4875 की बची सबसे कठिन तीन पोस्टों को जीतने का गौरव प्राप्त हुआ।
राइफलमैन संजय का पराक्रम देख दुश्मन रह गया हक्का बक्का
प्वाइंट 4875 कॉम्प्लेक्स के अत्यंत महत्वपूर्ण ‘फ्लैट टॉप’ एरिया पर दो तरफा ऑपरेशन की शुरुआत 3 जुलाई को रात 9 बजे हो चुकी थी। अल्फा कंपनी के कंपनी कमांडर मेजर एस वी भास्कर के नेतृत्व में दक्षिण दिशा से और चार्ली कंपनी द्वारा मेजर गुरप्रीत सिंह की अगुवाई में फिंगर एरिया की तरफ से आक्रमण करने की योजना पर अमल शुरू हो गया था।
5 जुलाई तक सभी पोस्ट 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स ने बहादुरी से लड़ते हुए जीत ली थीं। इनमें प्रमुख थीं पिंपल, व्हेल बैक और शिवलिंग। इसी अभियान के साथ थे राइफलमैन संजय कुमार जिन्होंने अद्भुत साहस और सूझबूझ का परिचय देते हुए लेज एरिया की आगे की चौकियों पर अकेले ही अपने दम पर विजय पाई।
संजय कुमार ग्रेनेड फेंकते हुए अकेले ही रेंगते हुए मोर्चे तक पहुंच गए और मोर्चे के अंदर कूद गए। इससे दुश्मन हल्का बक्का रह गया। इस दौरान उन्हीं की मशीनगन छीनकर तीन पाकिस्तानियों को मार डाला। संजय कुमार को इसके लिए परमवीर चक्र से नवाजा गया और उन्हीं के कंपनी कमांडर मेजर एस वी भास्कर को वीर चक्र प्रदान किया गया। इनके अलावा मेजर गुरप्रीत सिंह और लांस नायक सरवन सिंह को सेना मेडल मिला।
कैप्टन नागप्पा के घायल होते ही विक्रम बत्रा ने संभाला मोर्चा
सबसे दुर्गम रास्ते के बीचों बीच कंपनी कमांडर विकास वोहरा की अगुवाई में लेज एरिया की तरफ 30 जवानों का दल आगे बढ़ रहा था। इस बीच कैप्टन नागप्पा के दल का भारी नुकसान हो गया था। कैप्टन विक्रम बत्रा का दल उसके ठीक नीचे कुछ दूरी पर था, जिन्होंने कैप्टन नवीन नागप्पा को घायल अवस्था में उठाकर नीचे पहुंचाया और दस्ते का नेतृत्व संभाल लिया।
कैप्टन बत्रा का दल आगे वाले दुश्मन से घिरे हुए दस्ते को बचाने के लिए आगे बढ़ा और एक-एक कर मोर्चे तबाह करते चला गया। बुरी तरह घायल होने के बाद भी उन्होंने दुश्मन के तीन भारी मशीनगन वाले लेज के सभी बाकी मोर्चो पर विजय पाई और अकेले सात सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। लेकिन बाद में दूर से आती हुई दुश्मन की गोलियों की बौछार से शहीद हो गए।
इसी अभियान के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र मिला और उनके साथी कैप्टन नागप्पा को सेना मेडल। तब तक कंपनी कमांडर विकास बोहका बाकी सैनिकों के साथ वहां पहुंच कर मोर्चा संभाल कर दुश्मन के शेष सैनिकों का भी सफाया कर दिया और खुद 4875 पर तिरंगा फहराया। युद्ध के अंत में यूनिट के तत्कालीन सीओ, लेफ्टिनेंट कर्नल वाई के जोशी और मेजर विकास वोहरा को वीर चक्र से नवाजा गया।