{"_id":"6186e5caa3bbe06a0d68abe0","slug":"jammu-kashmir-agriculture-seffron-jammu-news-jmu247308677","type":"story","status":"publish","title_hn":"इंडोर खेती : घाटी में अब घर में उगाया जा रहा कश्मीरी केसर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
इंडोर खेती : घाटी में अब घर में उगाया जा रहा कश्मीरी केसर
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
श्रीनगर। घाटी में अब इंडोर खेती के माध्यम से घर में केसर उगाया जा रहा है। इस नई तकनीक से किसानों के वारे न्यारे हो गए हैं। इस तकनीक से पहली बार सामान्य उपज की तुलना में इस साल 50 फीसदी ज्यादा पैदावार हुई है। सैकड़ों किसान इंडोर क्लटीवेशन की तकनीक अपनाकर सीमित भूमि से कई गुना पैदावार हासिल कर रहे हैं। इसके साथ ही केसर उत्पादक जीआई टैगिंग से भी जुड़े हैं, जिन्हें गुणवत्ता गारंटी के चलते अच्छे दाम मिल रहे हैं। प्रोसेसिंग की नई तकनीक से कश्मीर के केसर की गुणवत्ता दुनिया भर में नंबर-वन पर पहुंचाने के अलावा अब कश्मीर की स्कॉस्ट यूनिवर्सिटी कश्मीर के विशेषज्ञों का मानना है कि गुणवत्ता के साथ-साथ अब क्वांटिटी पर भी इस तकनीक से लाभ होगा। इस तकनीक को अपनाने वाले किसानों को अच्छे नतीजों की उम्मीद है।
सैफरन ग्रोवर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अब्दुल मजीद वानी ने केसर की इंडोर कल्टीवेशन को अपनाया है। उन्होंने अमर उजाला के साथ विशेष बातचीत में बताया कि इस तकनीक को पहली बार अपनाया गया है। फसल काफी अच्छी हुई है, आने वाले एक-दो दिन में इसे तोड़ेंगे। बताया कि सामान्य खेती से काफी ज्यादा फायदे हैं इस तकनीक के। वानी ने कहा कि पहला फायदा यह कि अगर किसी के पास काम जमीन है तो वो इस तकनीक को अपना सकता है, दूसरा फायदा कि जमीनें कम हो रही है इसलिए वर्टिकल फार्मिंग से पांच गुना अधिक पैदावार इस तकनीक से ले सकते हैं, जिसमें मेहनत कम है। और तीसरा फायदा यह कि तकनीक से उगाई गई फसल की गुणवत्ता सामान्य खेती से काफी ज्यादा है।
वानी ने बताया कि इस साल करीब 500 किलो कॉर्म लगाए हैं। पिछले साल पैदावार कम थी, लेकिन इस साल सामान्य खेती से 50.60 फीसदी ज्यादा हुई है फसल। पिछले साल जो लगाया गया था उसका उसका चौथा हिस्सा उग पाया था। जीआई टैगिंग की तकनीक को लेकर उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष केवल 10.15 किलो केसर सैफरन पार्क में गुणवत्ता जांच के लिए आया था, लेकिन जब अन्य किसानों ने देखा कि जिन्होंने जीआई टैगिंग करवाई थी उन्हें दोगुना लाभ मिला, उसे देख इस साल 500 से ज्यादा किसान जुड़े हैं।
विज्ञापन
बता दे कि केसर की शुद्धता को मापने के लिए ऐसे आठ मापदंड हैं, जिनपर इन नमूनों का परीक्षण किया जाता है, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है। किसान ने बताया कि इन आठ मापदंडों में से नमी, बाहरी पदार्थ, और विदेशी पदार्थ, कुल राख तीन मुख्य मापदंड हैं। इसके बाद केसर की ग्रेडिंग होती है और फिर ई-ऑक्शन करते हैं। केसर के खेतों में तीन से चार कनाल एक किलो बारीक केसर पैदा करते हैं। गुणवत्ता और मांग के आधार पर प्रत्येक किलोग्राम की कीमत 1.6 लाख रुपये से 2.2 लाख रुपये के बीच होती है। एक दशक पहले कश्मीर में केसर की खेती करने वाले 22 हजार परिवार थे, लेकिन संख्या घटकर लगभग 16 हजार परिवार रह गई है। केसर सालाना लगभग 300 करोड़ रुपये का राजस्व उत्पन्न करता है। कृषि विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार कश्मीर में केसर की खेती का रकबा 43.9 प्रतिशत घटकर 1996 में लगभग 5.707 हेक्टेयर से घटकर 3.200 हेक्टेयर रह गया है। कश्मीरी केसर के उत्पादन में पिछले दो दशकों में 65 फीसदी की गिरावट आई है, जो सालाना 16 मीट्रिक टन से 5.6 मीट्रिक टन हो गया है।
------
कश्मीर का केसर स्पेन और ईरान से बेहतर
एक अधिकारी ने बताया कि सैफरन पार्क में उन सभी मापदंडों को सहेजते हैं जो कश्मीर के केसर को सर्वश्रेष्ठ ग्रेड प्राप्त करने में मदद करते हैं। कश्मीर का केसर स्पेन और ईरान के केसर से बेहतर माना जाता है। इस गुणवत्ता आश्वासन और जीआई टैगिंग के साथ केसर को सभी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्लेटफार्मों पर बेच सकते हैं। इससे न केवल खरीदार को शुद्ध कश्मीरी केसर मिलता है, बल्कि किसानों को अच्छा दाम भी।
क्रोसिन की उच्च सांद्रता के कारण कश्मीरी केसर बेहतर गुणवत्ता का है। क्रोसिन एक कैरोटीनॉइड वर्णक है, जो केसर को उसके रंग और औषधीय मूल्य देता है। ईरानी केसर की 6.82 फीसदी की तुलना में कश्मीरी केसर में क्रिकीन कंटैंट 8.72 फीसदी है, जो इसे एक गहरा रंग और बढ़िया औषधीय मूल्य प्रदान करता है।
-----
ये है केसर उगाने की प्रक्रिया
केसर दरअसल फूलों का स्टिग्मा होता है। हर एक फूल में करीब तीन से चार स्टिग्मा होते हैं। इसकी खेती पूरी तरह से कश्मीरी लोग हाथों से करते हैं। और हर वर्ष करीब ढाई से तीन लाख केसर के फूल हाथों से तोड़े जाते हैं, जिनमें से वो इन स्टिग्मा को खुद हाथों से निकालकर उसे सुखाते है। इस सब प्रक्रिया के बाद कश्मीर का शुद्ध मोंगरा केसर मिल पाता है।
विज्ञापन
सैफरन ग्रोवर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अब्दुल मजीद वानी ने केसर की इंडोर कल्टीवेशन को अपनाया है। उन्होंने अमर उजाला के साथ विशेष बातचीत में बताया कि इस तकनीक को पहली बार अपनाया गया है। फसल काफी अच्छी हुई है, आने वाले एक-दो दिन में इसे तोड़ेंगे। बताया कि सामान्य खेती से काफी ज्यादा फायदे हैं इस तकनीक के। वानी ने कहा कि पहला फायदा यह कि अगर किसी के पास काम जमीन है तो वो इस तकनीक को अपना सकता है, दूसरा फायदा कि जमीनें कम हो रही है इसलिए वर्टिकल फार्मिंग से पांच गुना अधिक पैदावार इस तकनीक से ले सकते हैं, जिसमें मेहनत कम है। और तीसरा फायदा यह कि तकनीक से उगाई गई फसल की गुणवत्ता सामान्य खेती से काफी ज्यादा है।
विज्ञापन
वानी ने बताया कि इस साल करीब 500 किलो कॉर्म लगाए हैं। पिछले साल पैदावार कम थी, लेकिन इस साल सामान्य खेती से 50.60 फीसदी ज्यादा हुई है फसल। पिछले साल जो लगाया गया था उसका उसका चौथा हिस्सा उग पाया था। जीआई टैगिंग की तकनीक को लेकर उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष केवल 10.15 किलो केसर सैफरन पार्क में गुणवत्ता जांच के लिए आया था, लेकिन जब अन्य किसानों ने देखा कि जिन्होंने जीआई टैगिंग करवाई थी उन्हें दोगुना लाभ मिला, उसे देख इस साल 500 से ज्यादा किसान जुड़े हैं।
विज्ञापन
बता दे कि केसर की शुद्धता को मापने के लिए ऐसे आठ मापदंड हैं, जिनपर इन नमूनों का परीक्षण किया जाता है, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है। किसान ने बताया कि इन आठ मापदंडों में से नमी, बाहरी पदार्थ, और विदेशी पदार्थ, कुल राख तीन मुख्य मापदंड हैं। इसके बाद केसर की ग्रेडिंग होती है और फिर ई-ऑक्शन करते हैं। केसर के खेतों में तीन से चार कनाल एक किलो बारीक केसर पैदा करते हैं। गुणवत्ता और मांग के आधार पर प्रत्येक किलोग्राम की कीमत 1.6 लाख रुपये से 2.2 लाख रुपये के बीच होती है। एक दशक पहले कश्मीर में केसर की खेती करने वाले 22 हजार परिवार थे, लेकिन संख्या घटकर लगभग 16 हजार परिवार रह गई है। केसर सालाना लगभग 300 करोड़ रुपये का राजस्व उत्पन्न करता है। कृषि विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार कश्मीर में केसर की खेती का रकबा 43.9 प्रतिशत घटकर 1996 में लगभग 5.707 हेक्टेयर से घटकर 3.200 हेक्टेयर रह गया है। कश्मीरी केसर के उत्पादन में पिछले दो दशकों में 65 फीसदी की गिरावट आई है, जो सालाना 16 मीट्रिक टन से 5.6 मीट्रिक टन हो गया है।
------
कश्मीर का केसर स्पेन और ईरान से बेहतर
एक अधिकारी ने बताया कि सैफरन पार्क में उन सभी मापदंडों को सहेजते हैं जो कश्मीर के केसर को सर्वश्रेष्ठ ग्रेड प्राप्त करने में मदद करते हैं। कश्मीर का केसर स्पेन और ईरान के केसर से बेहतर माना जाता है। इस गुणवत्ता आश्वासन और जीआई टैगिंग के साथ केसर को सभी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्लेटफार्मों पर बेच सकते हैं। इससे न केवल खरीदार को शुद्ध कश्मीरी केसर मिलता है, बल्कि किसानों को अच्छा दाम भी।
क्रोसिन की उच्च सांद्रता के कारण कश्मीरी केसर बेहतर गुणवत्ता का है। क्रोसिन एक कैरोटीनॉइड वर्णक है, जो केसर को उसके रंग और औषधीय मूल्य देता है। ईरानी केसर की 6.82 फीसदी की तुलना में कश्मीरी केसर में क्रिकीन कंटैंट 8.72 फीसदी है, जो इसे एक गहरा रंग और बढ़िया औषधीय मूल्य प्रदान करता है।
-----
ये है केसर उगाने की प्रक्रिया
केसर दरअसल फूलों का स्टिग्मा होता है। हर एक फूल में करीब तीन से चार स्टिग्मा होते हैं। इसकी खेती पूरी तरह से कश्मीरी लोग हाथों से करते हैं। और हर वर्ष करीब ढाई से तीन लाख केसर के फूल हाथों से तोड़े जाते हैं, जिनमें से वो इन स्टिग्मा को खुद हाथों से निकालकर उसे सुखाते है। इस सब प्रक्रिया के बाद कश्मीर का शुद्ध मोंगरा केसर मिल पाता है।