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Jammu News: एप से कमाई, बाइक ही दफ्तर, जम्मू में बढ़ते गिग वर्कर्स
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- शहर में 1,200 से ज्यादा युवा कर रहे एप्स के जरिये डिलीवरी का काम
- ई-श्रम पोर्टल पर दर्ज हैं 486 गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स
- ऑनलाइन सेवा प्रदाता कंपनियों ने भी बढ़ाई रफ्तार
गौरव रावत
जम्मू। शहर की सड़कों पर तेजी से दौड़ती बाइक अब सिर्फ ट्रैफिक का हिस्सा नहीं हैं। ये नए दौर के श्रमिकों की पहचान बन गई हैं। कभी पारंपरिक मजदूरी करने वाले युवा अब मोबाइल एप के जरिये खाना, सामान और सेवाएं लोगों के दरवाजे तक पहुंचा रहे हैं। जम्मू में गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स की तादाद लगातार बढ़ रही है। इनका काम अस्थायी जरूर है, लेकिन शहरवासियों के रोजमर्रा के जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुका है।
गिग इकोनॉमी यानी वो प्रणाली जहां लोग फुल टाइम नौकरी की बजाय एप आधारित कंपनियों के साथ पार्ट टाइम या कांट्रेक्ट पर काम करते हैं, जम्मू में भी अब धीरे-धीरे पांव पसार रही है। एक ऑनलाइन सेवा प्रदाता कंपनियों ने जम्मू में हाल ही में काम शुरू किया है। कंपनी में टीम लीडर के पद पर कार्यरत अतुल कुमार ने बताया कि उनकी कंपनी के शहर में 350 से ज्यादा डिलीवरी पार्टनर एक्टिव हैं। यह संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है।
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1200 से ज्यादा एक्टिव वर्कर
शहर में इन एप आधारित कंपनियों से जुड़े करीब 1200 से ज्यादा गिग वर्कर्स रोजाना शहर के अलग-अलग हिस्सों में डिलीवरी का काम कर रहे हैं। केंद्र सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में ई-श्रम पोर्टल पर 486 श्रमिक गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के रूप में पंजीकृत हैं। इनमें से 326 पुरुष और 160 महिलाएं हैं। इन्हीं लोगों को आधिकारिक रूप से सरकार की योजनाओं से जुड़ने का मौका मिल सकता है।
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आमदनी ठीक-ठाक, लेकिन नहीं मिलता पीएफ और छुट्टी
आरएस पुरा निवासी डिलीवरी बॉय केशव कुमार ने बताया कि हर दिन की कमाई तय नहीं होती। ऑर्डर ज्यादा हों तो दिन के 1200-1300 रुपये तक बन जाते हैं, नहीं तो 700-800 रुपये तक की कमाई तो हो ही जाती है। सबसे अच्छी बात यही है कि कोई बॉस नहीं है, अपने टाइम पर काम करते हैं। शहर के नानक नगर निवासी गुरु स्वामी ने बताया कि काम में लचीलापन जरूर है, लेकिन साप्ताहिक छुट्टी, पीएफ या बीमा जैसी सुविधाएं नहीं हैं। बीमार होने या एक्सीडेंट की स्थिति में कमाई बिल्कुल बंद हो जाती है। लगातार ज्यादा दिन छुट्टी लें तो कंपनी आईडी ब्लॉक भी कर देती है।
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ये होते हैं गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर
जो किसी कंपनी के स्थायी कर्मचारी न होकर एक-एक काम या टास्क के आधार पर काम करते हैं, जैसे खाना पहुंचाना, कैब चलाना या किसी सर्विस को ग्राहक तक पहुंचाना, वे गिग वर्कर्स कहलाते हैं। जब ये काम मोबाइल एप या वेबसाइट के जरिए किया जाता है, तो ऐसे श्रमिकों को प्लेटफॉर्म वर्कर कहा जाता है। ऑनलाइन सेवा प्रदाता कंपनियों से जुड़े वर्कर इसी श्रेणी में आते हैं। ये पारंपरिक श्रमिकों से अलग होते हैं, क्योंकि इनके पास फिक्स नौकरी नहीं होती, काम का समय लचीला होता है और अधिकतर को बीमा, पीएफ या छुट्टी जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं।
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सरकार से निर्देश मिलने के बाद गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के श्रम कार्ड बनाने का काम शुरू हो गया है। अगर जरूरत पड़ती है, तो इनको सुविधाएं देने और सरकारी योजनाओं से जोड़ने के लिए प्रावधान भी किए जा सकते हैं।
-चरणदीप सिंह, श्रम आयुक्त, जम्मू-कश्मीर
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- ई-श्रम पोर्टल पर दर्ज हैं 486 गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स
- ऑनलाइन सेवा प्रदाता कंपनियों ने भी बढ़ाई रफ्तार
गौरव रावत
जम्मू। शहर की सड़कों पर तेजी से दौड़ती बाइक अब सिर्फ ट्रैफिक का हिस्सा नहीं हैं। ये नए दौर के श्रमिकों की पहचान बन गई हैं। कभी पारंपरिक मजदूरी करने वाले युवा अब मोबाइल एप के जरिये खाना, सामान और सेवाएं लोगों के दरवाजे तक पहुंचा रहे हैं। जम्मू में गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स की तादाद लगातार बढ़ रही है। इनका काम अस्थायी जरूर है, लेकिन शहरवासियों के रोजमर्रा के जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुका है।
गिग इकोनॉमी यानी वो प्रणाली जहां लोग फुल टाइम नौकरी की बजाय एप आधारित कंपनियों के साथ पार्ट टाइम या कांट्रेक्ट पर काम करते हैं, जम्मू में भी अब धीरे-धीरे पांव पसार रही है। एक ऑनलाइन सेवा प्रदाता कंपनियों ने जम्मू में हाल ही में काम शुरू किया है। कंपनी में टीम लीडर के पद पर कार्यरत अतुल कुमार ने बताया कि उनकी कंपनी के शहर में 350 से ज्यादा डिलीवरी पार्टनर एक्टिव हैं। यह संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है।
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1200 से ज्यादा एक्टिव वर्कर
शहर में इन एप आधारित कंपनियों से जुड़े करीब 1200 से ज्यादा गिग वर्कर्स रोजाना शहर के अलग-अलग हिस्सों में डिलीवरी का काम कर रहे हैं। केंद्र सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में ई-श्रम पोर्टल पर 486 श्रमिक गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के रूप में पंजीकृत हैं। इनमें से 326 पुरुष और 160 महिलाएं हैं। इन्हीं लोगों को आधिकारिक रूप से सरकार की योजनाओं से जुड़ने का मौका मिल सकता है।
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आमदनी ठीक-ठाक, लेकिन नहीं मिलता पीएफ और छुट्टी
आरएस पुरा निवासी डिलीवरी बॉय केशव कुमार ने बताया कि हर दिन की कमाई तय नहीं होती। ऑर्डर ज्यादा हों तो दिन के 1200-1300 रुपये तक बन जाते हैं, नहीं तो 700-800 रुपये तक की कमाई तो हो ही जाती है। सबसे अच्छी बात यही है कि कोई बॉस नहीं है, अपने टाइम पर काम करते हैं। शहर के नानक नगर निवासी गुरु स्वामी ने बताया कि काम में लचीलापन जरूर है, लेकिन साप्ताहिक छुट्टी, पीएफ या बीमा जैसी सुविधाएं नहीं हैं। बीमार होने या एक्सीडेंट की स्थिति में कमाई बिल्कुल बंद हो जाती है। लगातार ज्यादा दिन छुट्टी लें तो कंपनी आईडी ब्लॉक भी कर देती है।
ये होते हैं गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर
जो किसी कंपनी के स्थायी कर्मचारी न होकर एक-एक काम या टास्क के आधार पर काम करते हैं, जैसे खाना पहुंचाना, कैब चलाना या किसी सर्विस को ग्राहक तक पहुंचाना, वे गिग वर्कर्स कहलाते हैं। जब ये काम मोबाइल एप या वेबसाइट के जरिए किया जाता है, तो ऐसे श्रमिकों को प्लेटफॉर्म वर्कर कहा जाता है। ऑनलाइन सेवा प्रदाता कंपनियों से जुड़े वर्कर इसी श्रेणी में आते हैं। ये पारंपरिक श्रमिकों से अलग होते हैं, क्योंकि इनके पास फिक्स नौकरी नहीं होती, काम का समय लचीला होता है और अधिकतर को बीमा, पीएफ या छुट्टी जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं।
सरकार से निर्देश मिलने के बाद गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के श्रम कार्ड बनाने का काम शुरू हो गया है। अगर जरूरत पड़ती है, तो इनको सुविधाएं देने और सरकारी योजनाओं से जोड़ने के लिए प्रावधान भी किए जा सकते हैं।
-चरणदीप सिंह, श्रम आयुक्त, जम्मू-कश्मीर