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नेकां के सामने डैमेज कंट्रोल की चुनौती: 24 विधायकों का संगठित विरोध बना गंभीर सिरदर्द; अब शुक्रवार पर निगाहें

Thu, 05 Nov 2026 03:01 PM IST
Sharukh Khan प्रवेश कुमारी, अमर उजाला, जम्मू
प्रवेश कुमारी, अमर उजाला, जम्मू Published by: Sharukh Khan Updated Thu, 05 Nov 2026 03:01 PM IST
सार

जम्मू-कश्मीर की उमर सरकार और नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए भाजपा और सांसद की बगावत सिरदर्द बन गई है। 24 विधायकों का संगठित विरोध जारी है। असंतोष ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के आलाकमान के सामने अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक और सांगठनिक डैमेज कंट्रोल की चुनौती खड़ी कर दी है। सियासी तूफान की जड़ 27 अक्तूबर को हुआ  कैबिनेट विस्तार है।

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J&K Politics: 24 National Conference MLAs Unite in Protest, Party Faces Major Damage Control Challenge
J&K Politics - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

जम्मू-कश्मीर की सियासत में इस समय नेशनल कॉन्फ्रेंस दोतरफा दबाव का सामना कर रही है। एक तरफ जहां श्रीनगर के सांसद आगा रुहुल्ला मेहदी के इस्तीफे ने पहले ही पार्टी को असहज कर रखा है, वहीं अब दो दर्जन विधायकों के संगठित विरोध ने सरकार और पार्टी संगठन के लिए गंभीर सिरदर्द पैदा कर दिया है।
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इस सियासी तूफान की जड़ 27 अक्तूबर का कैबिनेट विस्तार है। पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ विधायकों का आरोप है कि मंत्रिमंडल में नए चेहरों और चुनिंदा नेताओं को तवज्जो देकर दशकों से पार्टी का झंडा थामने वाले कद्दावर नेताओं को दरकिनार कर दिया गया।
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असंतुष्ट खेमे का तर्क है कि इस फेरबदल में न केवल वरिष्ठता की अवहेलना हुई, बल्कि क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन को भी नजरअंदाज किया गया। नतीजतन, सत्ता में व्यापक भागीदारी की उम्मीद लगाए बैठे जनप्रतिनिधियों में तीखी नाराजगी फैल गई।
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उभरे असंतोष ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के आलाकमान के सामने अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक और सांगठनिक डैमेज कंट्रोल की चुनौती खड़ी कर दी है। सत्ता संतुलन, वरिष्ठता की अनदेखी और फैसलों के कथित केंद्रीकरण को लेकर करीब दो दर्जन विधायक बागी तेवर अपनाए हुए हैं। पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ता और वरिष्ठ नेता लगातार यह दावा कर रहे हैं कि नेकां एक परिवार है।

सभी गिले-शिकवे जल्द सुलझा लिए जाएंगे, लेकिन विधायकों की गुप्त लामबंदी कुछ और ही संकेत दे रही है। ऐसे में शुक्रवार को पार्टी आलाकमान और असंतुष्ट विधायकों के बीच होने वाली प्रस्तावित बैठक को जम्मू-कश्मीर की राजनीति और उमर सरकार के स्थायित्व के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।

गुप्त बैठकों से ज्ञापन तक... संगठित लामबंदी
विधायकों की यह नाराजगी सिर्फ जुबानी बयानों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने संगठित रूप ले लिया है। असंतोष की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले एक सप्ताह के दौरान श्रीनगर में बंद कमरों के भीतर चार अलग-अलग गुप्त बैठकें हो चुकी हैं। 
 

असंतुष्ट विधायकों ने अपनी रणनीति को औपचारिक शक्ल देते हुए आलाकमान को विस्तृत ज्ञापन सौंपा है। इसमें स्पष्ट रूप से सरकार के मौजूदा ढांचे पर पुनर्विचार करने, तत्काल मंत्रिमंडल में फेरबदल करने और संगठन के भीतर आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करने की मांग रखी गई है। विधायकों का मुख्य आक्षेप सत्ता के केंद्रीकरण और नीतिगत फैसलों में जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा को लेकर है।
 

संकट का हल निकालने की कोशिश करेंगे नेकां अध्यक्ष
नेकां के भीतर मचे घमासान पर दो दिन में फैसला आ सकता है। दिल्ली में मौजूद पार्टी प्रमुख डॉ. फारूक अब्दुल्ला घाटी लौटकर नाराज विधायकों से बैठक कर संकट का हल निकालने की कोशिश करेंगे। 

 

सूत्रों के अनुसार, वह पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। पार्टी से असंतुष्ट विधायकों ने फारूक से हस्तक्षेप की मांगकरते हुए करीब 10 सूत्रीय मांगों का पत्र भेजा है। इसमें दाछिगाम विधायक दल की बैठक के फैसलों पर अमल की मुख्य मांग शामिल है। 

इसमें तीन नेताओं के नाम भी हैं। इसके अलावा फारूक से मामले में हस्तक्षेप की मांग की है। इस बीच, पार्टी प्रवक्ता इमरान नबी डार ने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस एक परिवार है और आंतरिक मतभेदों को बातचीत के जरिए जल्द सुलझा लिया जाएगा।

अब शुक्रवार पर निगाहें
अब सबकी निगाहें शुक्रवार को श्रीनगर में होने वाली प्रस्तावित बैठक पर टिकी हैं, जहां असंतुष्ट विधायकों का प्रतिनिधिमंडल शीर्ष नेतृत्व से रूबरू होगा। यह बैठक केवल आंतरिक सुलह का जरिया नहीं, बल्कि उमर सरकार के राजनीतिक भविष्य और राजनीतिक पकड़ की सबसे कड़ी परीक्षा साबित होने जा रही है।


 

इधर भी चुनौती... नेकां की नाराजगी को भुनाने में जुटी पीडीपी, संगठन को मजबूत करने पर जोर
नेकां में उभरे असंतोष के बीच पीडीपी कश्मीर की सियासत में अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश में जुट गई है। अध्यक्ष महबूवा मुफ्ती की सियासी सक्रियता से संगठनात्मक स्तर पर नए नेताओं को जोड़ने तक पीडीपी ने गतिविधियां तेज कर दी हैं।

 

श्रीनगर में कार्यकर्ता सम्मेलन के बाद किश्तवाड़ में नेकां के पूर्व प्रांतीय सचिव व पूर्व पार्षद शाहिद हुसैन कृपाक का पीडीपी में शामिल होना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पार्टी की कोशिश नेकां में नाराजगी के बीच खुद को एक राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित करने की है। 

दो नवंबर को श्रीनगर में कार्यकर्ता सम्मेलन में मुफ्ती ने नेकां और केंद्र सरकार दोनों को निशाने पर लिया। उन्होंने केंद्र और जम्मू-कश्मीर के बीच बढ़ते अविश्वास के लिए नेकां को जिम्मेदार ठहराते हुए आरोप लगाया कि पार्टी कश्मीर मुद्दे पर बार-बार रुख बदलती रही है। कहा- कब तक सख्ती के दम पर कश्मीर में शांति कायम रखने की कोशिश की जाएगी। कहा, लोगों का भरोसा जीतने के लिए संवाद और अधिकारों की बहाली जरूरी है। 

स्थापना दिवस पर भी उन्होंने 2019 की गलतियों को नहीं दोहराने की चेतावनी देते हुए घाटी की आवाज और भावनाओं को नजरअंदाज नहीं करने की बात कही थी। पीडीपी की इस सक्रियता के पीछे नेकां के भीतर सामने आ रहा असंतोष भी अहम है। सांसद आगा सैयद रुहुल्ला की पार्टी से दूरी और इस्तीफे के एलान के बाद नेकां के कुछ विधायकों की नाराजगी भी चर्चा में है। 

पार्टी में उठ रहे इन सवालों ने विपक्ष को सरकार व संगठन की स्थिति पर सवाल उठाने का मौका दिया है। दरअसल, 2019 के बाद पीडीपी खुद इसी तरह के सियासी संकट से गुजरी थी। कई नेताओं के पार्टी छोड़ने से संगठन कमजोर हुआ व नेकां को इसका लाभ मिला। अब पीडीपी पार्टी को दोबारा खड़ा करने और दूसरे दलों से नेताओं को अपने साथ जोड़ने पर जोर दे रही है।
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