कोर्ट का अहम फैसला: सिर्फ पैसा न लौटाना धोखाधड़ी नहीं, हर लेन-देन पर क्रिमिनल केस नहीं किया जा सकता
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा कि सिविल लेन-देन में पैसे न लौटाना धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता, जब तक धोखाधड़ी की नीयत साबित न हो।
-
- 1
-
Link Copied
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि अगर कोई व्यक्ति व्यापारिक या निवेश के वादे पर पैसा लेता है और बाद में लौटा नहीं पाता, तो इसे आपराधिक धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता। बशर्ते जब तक यह साबित न हो जाए कि शुरू से ही उसकी नीयत गलत थी। पीठ ने कहा कि महज सिविल लेन-देन या कॉन्ट्रैक्ट के टूटने को अपराध नहीं कहा जा सकता। ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज कराना कानून का दुरुपयोग है।
मामला पुलिस विभाग में कार्यरत एक शिकायतकर्ता से जुड़ा है। जिसने आरोप लगाया कि 2019 में उसके कुछ सहकर्मीयों ने उसे एक निवेश योजना का प्रस्ताव दिया और दावा किया कि अगर वह निवेश करता है, तो उसे सालाना 18 फीसदी मुनाफा मिलेगा। इसपर उसने करीब 96 लाख रुपये अपने सहकर्मियों को दिए।
बाद में उसके सहकर्मियों ने करीब 37 लाख रुपये लौटा दिए, लेकिन बचे 58 लाख रुपये नहीं लौटाए। इसपर उसने धोखाधड़ी और विश्वासघात का आरोप लगाते हुए कठुआ के जिला मजिस्ट्रेट के पास सीआरपीसी की 56(3) के तहत आवेदन दिया। इसपर मजिस्ट्रेट ने पुलिस को एफआईआर करने का आदेश दिया। पुलिस द्वारा इसमें देरी होने पर शिकायतकर्ता ने कोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल की।
इसके बाद दोनों पक्षों में समझौता हो गया। शिकायतकर्ता ने भी लिखित रूप से सभी कानूनी कार्यवाही वापस लेने की बात कही, लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने बाद में एफआईआर दर्ज की और शिकायतकर्ता ने फिर से आरोप लगाए कि समझौता धोखे से कराया गया था। इसके बाद दूसरे पक्ष ने एफआईआर को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की।
मामले में फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी साबित करने के लिए यह ज़रूरी है कि शुरू से ही बेईमानी की नीयत हो। मामले में आरोपियों ने पहले ही बड़ी रकम लौटा दी थी, जिससे यह संकेत मिलता है कि उनकी मंशा शुरुआत से ही गलत नहीं थी। कोर्ट ने माना कि शिकायतकर्ता का बाद में समझौते से पलटना और फिर से केस दर्ज करवाना सिर्फ बकाया राशि की वसूलने का तरीका था। इसी के साथ कोर्ट ने एफआईआर को रद्द कर दिया।