Hyderpora Encounter: क्रब से नहीं निकाला जाएगा शव, हाईकोर्ट का परिजनों को पांच लाख मुआवजा देने का निर्देश
अदालत ने कहा कि किसी की मृत्यु के बाद उसे अंतिम रीति रिवाज के हक से वंचित नहीं रखा जा सकता। अदालत ने अपने 11 पृष्ठीय आदेश में कहा कि इस व्यवस्था को भविष्य के लिए नजीर नहीं बनाया जाना चाहिए।
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हैदरपोरा मुठभेड़ में मारे गए रामबन निवासी युवक आमिर माग्रे के परिवार को पांच लाख रुपये का मुआवजा मिलेगा। साथ ही पिता लतीफ माग्रे समेत 10 लोगों को कुपवाड़ा में उसकी कब्र पर जाकर फातिहा ख्वानी (अंतिम धार्मिक प्रार्थना) की भी अनुमति होगी। हालांकि शव कब्र से नहीं निकाला जाएगा। जम्मू-कश्मीर व लद्दाख उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के आग्रह पर प्रदेश सरकार को यह निर्देश दिए।
पिता समेत 10 लोगों को फातिहा ख्वानी की अनुमति
मुख्य न्यायाधीश पंकज मित्थल और न्यायाधीश जावेद इकबाल वानी वाली खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के आग्रह के बाद एकल पीठ के आदेश के खिलाफ राज्य की अपील का निपटारा करते हुए परिवार को आमिर का चेहरा देखने की अनुमति देने से इन्कार करते हुए कहा कि इस मामले में कोविड नियमों को ध्यान में रखते हुए युवक के पिता लतीफ माग्रे समेत 10 लोगों को फातिहा ख्वानी की अनुमति दी जाती है।
अंतिम रीति रिवाज के हक से वंचित नहीं रखा जा सकता
प्रशासन परिवार के लोगों से चर्चा कर एक सप्ताह के अंदर यह तय करेगा कि फातिहा ख्वानी किस दिन होगी। अदालत ने कहा कि किसी की मृत्यु के बाद उसे अंतिम रीति रिवाज के हक से वंचित नहीं रखा जा सकता। अदालत ने अपने 11 पृष्ठीय आदेश में कहा कि इस व्यवस्था को भविष्य के लिए नजीर नहीं बनाया जाना चाहिए।
हैदरपोरा में चार लोगों को मुठभेड़ में किया था ढेर
अदालत ने 29 जून को जम्मू-कश्मीर के लिए महाधिवक्ता डीसी रैना और आमिर के पिता की अधिवक्ता दीपिका सिंह राजावत को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। मालूम हो कि पिछले साल नवंबर में सुरक्षाबलों ने श्रीनगर के हैदरपोरा में आमिर माग्रे समेत चार लोगों को मुठभेड़ में मार गिराया था।
पुलिस ने दावा किया था कि इमारत के व्यवसायी-मालिक और जिस परिसर में मुठभेड़ हुई थी, उसके किराएदार सहित सभी चार आतंकवादी या ओवरग्राउंड वर्कर थे। हालांकि मारे गए लोगों और राजनीतिक दलों के परिवारों के विरोध के कारण सरकार ने इमारत के मालिक अल्ताफ भट और किरायेदार मुदासिर के शव तीन दिनों के बाद वापस कर दिए।
इसके बाद रामबन निवासी आमिर माग्रे के पिता लतीफ माग्रे ने एक रिट याचिका दायर कर अपने बेटे के शव को निकालने की मांग की थी और यह भी मांग की थी कि इसे उनके पैतृक गांव में अंतिम संस्कार करने के लिए परिवार को सौंप दिया जाए। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने याचिका को स्वीकार कर पांच लाख रुपये का मुआवजा भी दिया था। जेएनएनफ
सुप्रीम कोर्ट के आग्रह पर हाईकोर्ट में सुनवाई
प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। अदालत ने शव निकालने पर रोक लगाते हुए बड़ी पीठ के समक्ष अपील करने के लिए कहा था। खंडपीठ ने प्रदेश सरकार के वकील के इस समझौते से सहमति जताई कि उत्खनन संभव नहीं था क्योंकि दफनाने के तुरंत बाद शव नष्ट होना शुरू हो चुका होगा।
इसके बाद मृतक के पिता ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष शव को निकालने की याचिका को छोड़ दिया था। इसके पश्चात सुप्रीम कोर्ट के अवकाशकालीन न्यायाधीश सूर्यकांत और जेबी परदीवाला ने हाईकोर्ट से इस मामले की सुनवाई का आग्रह किया था।