मसर्रत होगा गिलानी का उत्तराधिकारी: भाजपा
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पिछले कई दिनों से जम्मू कश्मीर में चल रहे बवाल के बीच ऐसी खबरें आ रही है कि जल्दी ही हुर्रियत कांफ्रेस जम्मू कश्मीर में सैय्यद अली शाह गिलानी के उत्तराधिकारी के रुप में चुन सकती है।
एक अंग्रेजी न्यूजपेपर के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी के एक सीनियर नेता का कहना है कि अलगावादी संगठन 'राष्ट्रवादी राज्य सरकार' के खिलाफ गिलानी के उत्तराधिकारी के रुप में मसर्रत आलम भट के खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं।
जम्मू कश्मीर में भाजपा के प्रवक्ता फ़ारुख खान अलगावादियों पर निशाना साधते हुए कहा कि, यासीन मलिक की अपील उसके चारों ओर केवल 1000 वर्ग मीटर तक ही फैलती है।
शब्बीर शाह 'कश्मीर का नेल्सन मंडेला' के रूप में बना हुआ एक कागजी शेर है। वहीं मीरवाइज उमर फारूक श्रीनगर में अपने शहर तक ही सीमित है और अब्बास अंसारी को हुर्रियत के बाहर कोई नहीं जानता है।
गिलानी अब बूढ़े हो चुके हैं। ऐसे में हुर्रियत ने गिलानी के उत्तराधिकारी के रुप में मसर्रत को चुन लिया है। फ़ारुख खान ने कहा कि ऐसे में पाकिस्तान को एक कट्टरपंथी की जरुरत है जो इस खाली पड़े स्पेस को भर सके।
चुनावों की हार से बौखला गए है अलगाववादी
नई दिल्ली में जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र के थिक टैंक के जवाहर लाल कौल का कहना है कि मसर्रत का कट्टरपंथी होने से हुर्रियत में खाली हो रही जगह को भरने का एक अच्छा विकल्प माना जा रहा है। जो सीमा पर के आकाओ के साथ बेहतर तालमेल रख सके और आलगावदियों के नेतृत्व को एक नई दिशा दे सके।
कौल के मुताबिक अलगाववादियों को मुख्य उद्देश्य 'उन लोगों को गुमराह कर रहे है जिनकी सोच में राज्य विवादित है। ' साथ ही कौल कहते है कि 'मसर्रत आलम हंगामा "हुर्रियत के मृत विचारों को नेतृत्व देने के लिए सिर्फ एक फर्जी राजनीतिक चाल है।'
संघ के एक नेता कहना है कि इस बार के विधानसभा चुनावों में अलगावदियों ने अपनी जमीन खो दी है। अब वे इस तरह के हंगामों से वे दुबारा पाने की कोशिश कर रहे है। वहीं अलगाववादी से से नेता बने सज्जाद गनी लोन इस समय भाजपा के कोटे से सरकार में मंत्री हैं।
कौल का कहना है कि तथ्य यह है किभाजपा जम्मू-कश्मीर में सत्ता में है, अलगाववादी विचारों के लिए इस तरह की हार इस बात का सबूत है कि कश्मीर में समय बदल रहा है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों को इस बात का अहसास है कि राज्य के अधिकांश क्षेत्रों अलगाववादियों द्वारा किए गए भारत विरोधी हंगामें के बावजूद अप्रभावित रहे। कौल के अनुसार, यह सुरक्षित रूप से कहा जा सकता है कि राज्य के केवल पांच जिलों श्रीनगर, अनंतनाग, बारामूला, शोपियां और पुलवाम हुर्रियत राजनीति से प्रभावित रहे है।