'हेरथ' कश्मीरी पंडितों का सबसे बड़ा त्योहार, जिसे कहते हैं महाशिवरात्रि, अद्भुत है पूजनविधि
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
महाशिवरात्रि का त्योहार शुक्रवार को पूरे देश में मनाया जाएगा। इसके लिए जम्मू-कश्मीर में भी खास तैयारियां चल रही हैं। कश्मीरी पंडितों का यह सबसे बड़ा त्योहार होता है और देश के अन्य हिस्सों की अपेक्षा इसे यहां ज्यादा धूमधाम से मनाया जाता है। कश्मीरी पंडित इसे 'हेरथ' के रूप में मनाते हैं। हेरथ शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है जिसका हिंदी अर्थ हररात्रि या शिवरात्रि होता है।
हेरथ को कश्मीरी संस्कृति के आंतरिक और सकारात्मक मूल्यों को संरक्षित रखने का पर्व भी माना जाता है। इसके साथ ही यह लोगों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बता दें कि कश्मीरी पंडित महाशिवरात्रि पर भगवान शिव सहित उनके परिवार की स्थापना घरों में करते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से वटुकनाथ घरों में मेहमान बनकर रहते हैं। करीब एक महीने पहले से इसे मनाने की तैयारियां शुरू हो जाती हैं।
खास बातें
इस त्योहार के दिन पूजन में प्रयोग में लाए जाने वाले बर्तनों को प्रतीकों के रूप में प्रयोग किया जाता है। उपलब्धता के अनुरूप कई घरों में पुराने समय के पीतल के बर्तनों को प्रयोग में लाते हैं। इस पूजन व घरों में बनने वाले व्यंजनों में कमल ककड़ी और गांठगोभी काफी प्रमुख होती है। जम्मू-कश्मीर में इसे मोंजी और नदरू के नाम से जाना जाता है।
पूजन विधि
कश्मीरी कैलेंडर के अनुसार शिव परिवार की स्थापना की जाती है। पूर्व में स्थापित किए जाने वाले इन मंदिरों को ठोकुर कुठ कहा जाता था। यहीं पर भगवान शिव के परिवार को स्थापित किया जाता है। कलश और गागर में अखरोट भरे जाते हैं। वहीं पूजन में अखरोट के प्रयोग के पीछे भी एक धार्मिक मान्यता है।
कहा जाता है कि अखरोट को चारों वेदों का प्रतीक माना जाता है। वहीं सोनिपतुल जिसे भगवान शिव का प्रतीक माना जाता है, इसकी पूजा की जाती है। इसके साथ ही पंच तत्व (पंचाम्रत) स्नान के बाद महिमनापार के साथ फूल, बेलपत्र, धतूरा का अभिषेक किया जाता है। वहीं पूजन विधि पूरी होने के बाद कश्मीरी पंडित एक दूसरे को हेरथ की शुभकामनाएं देकर शिवरात्रि पर्व को पूरा करते हैं।