जम्मू-कश्मीरः घाटी में एक साल के भीतर वायु सेना का तीसरा गरुड़ कमांडो मुठभेड़ में शहीद
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बांदीपोरा के हाजिन में सुरक्षा बलों और आतंकियों के बीच चल रही मुठभेड़ में भारतीय वायु सेना का एक और गरुड़ कमांडो शहीद हो गया है। बता दें कि इससे पहले 12 अक्टूबर को बांदीपोरा के हाजिन में ही सुरक्षा बलों और आतंकियों के बीच हुई मुठभेड़ में दो गरुड़ कमांडो शहीद हो गए थे जबकि इस मुठभेड़ में दो आतंकियों को भी मार गिराया गया था। जम्मू-कश्मीर में पहली बार एक साल के भीतर तीसरा गरुड़ कमांडो आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान शहीद हो गया है।
घाटी में 1990 से आतंकवाद के पनपने के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि एनकाउंटर में गरुड़ फोर्स के कमांडो शहीद हुए हैं। वायुसेना के गरुड़ कमांडो दस्ते के कई सदस्य इस समय जम्मू-कश्मीर में भारतीय थलसेना की अलग अलग बटालियन के साथ आतंकरोधी अभियानों के संचालन का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।
बता दें कि गरुड़ कमांडोज की ट्रेनिंग भी नेवी के मार्कोस और आर्मी के पैरा कमांडोज की तर्ज पर होती है। इन्हें एयरबॉर्न ऑपरेशंस, एयरफील्ड सीजर और काउंटर टेररेजम का जिम्मा उठाने के लिए तैयार किया जाता है।
कौन होते हैं गरूड़ कमांडो
हालात चाहे जो भी हो लेकिन पलक झपकते ही दुश्मन को निस्तनाबूत करने में सक्षम होते हैं इंडियन एयरफोर्स के गरुड़ कमांडो। एक ओर जहां इनके हौसले आसमान से भी ऊंचे होते है वहीं दूसरी ओर इनके अंदर धरती को भी हिला देने की ताकत और पानी के अंदर से वार करने की क्षमता होती है
ये कमांडो सिर्फ दुश्मनों से देश की हिफाजत ही नहीं करते बल्कि दुश्मन को उनके घर में घुस कर मारने में भी सक्षम होते हैं इंडियन एयरफोर्स के गरुड़ कमांडो।
52 हफ्तों तक होती है कड़ी ट्रेनिंग
गरूड़ कमांडोज को लगभग ढाई साल की कड़ी ट्रेनिंग के बाद तैयार किया जाता है। देश में लगभग दो हजार गरुड़ कमांडो हैं, जिन्हें ढाई साल की कड़ी ट्रेनिंग के बाद तैयार किया जाता है। बता दें कि ये ट्रेनिंग इतनी मुश्किल होती है कि कई तो बीच में ही छोड़ देते हैं।
ट्रेनिंग के दौरान इन कमांडोज को उफनती नदियों और आग से गुजरना, बिना किसी सहारे के पहाड़ पर चढ़ना पड़ता है। कई किमी की दौड़ और घने जंगलों में रात काटना भी इनकी कड़ी ट्रेनिंग का हिस्सा होता है। ट्रेनिंग के दौरान इनको अत्याधुनिक हथियारों को चलाना, हवाई हमले करने और रेस्क्यू ऑपरेशन्स करना खास तौर पर सिखाया जाता है।
2004 में हुई स्थापना
2001 में जम्मू-कश्मीर में एयर बेस पर हुए आतंकी हमले के बाद भारतीय वायु सेना को एक विशेष फोर्स की आवश्यकता महसूस हुई। इसके बाद वर्ष 2004 में एयरफोर्स ने अपने एयर बेस की सुरक्षा के लिए गरुड़ कमांडों फोर्स की स्थापना की।
खतरनाक हथियारों से लैस होते हैं गरूड़ कमांडो
वायु सेना के गरूड़ कमांडोज दुनिया के तमाम आधुनिक हथियारों से लैस होते हैं। इनके पास TAVOR टीएआर -21 असॉल्ट राइफल, ग्लॉक 17 और 19 पिस्टल के साथ MP5 सब मशीनगन, AKM असॉल्ट राइफल, एके-47 और आधुनिक कोल्ट एम-4 कार्बाइन से भी ये लैस होते हैं।