'गलवां घाटी सदियों से भारत का हिस्सा', गलवां नाले की खोज करने वाले गुलाम के पोते ने बताया घाटी का इतिहास
गलवां घाटी पिछले 200 साल से लद्दाख का हिस्सा रही है, चीन का दावा फर्जी और वह दादागीरी कर रहा है। उसका यहां कोई हक नहीं बनता। यह कहना है गलवां घाटी की खोज करने वाले गुलाम रसूल गलवां के पोते मोहम्मद अमीन गलवां का।
लेह जिले में रह रहे मोहम्मद अमीन गलवां चीन के तमाम दावों को सिरे से खारिज करते हैं। 1962 में भी चीन ने गलवां घाटी पर कब्जे की कोशिश की थी लेकिन भारतीय फौज ने उसे खदेड़ दिया था। हालांकि उन्होंने कहा,युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है। दोनों देशों को बातचीत से इस मसले को सुलझाना चाहिए।
12 साल की उम्र से अंग्रेजों के बने गाइड
मोहम्मद अमीन ने बताया कि उनके पूर्वज कश्मीर से थे। पूर्वजों को जम्मू-कश्मीर के महाराजा ने कश्मीर से निकाल दिया था। वे बाल्टिस्तान में चले गए। बाद में एक परिवार 1878 में लद्दाख आ गया। उनके दादा गुलाम रसूल गलवां 12 साल की उम्र से अंग्रेजों के साथ ट्रैकिंग पर जाते थे।
1890 के दशक में उनके दादा अंग्रेजों के एक ट्रैकिंग दल के साथ गए थे। मौसम खराब में फंस गए। गुलाम ने नया रूट तलाशा और सभी को सुरक्षित निकाला। इस रूट पर नदीनुमा नाले की खोज हुई, जिसे अंग्रेजों ने उनके दादा का नाम दे दिया। गलवां नाले के नाम से बाद में पूरी घाटी गलवां के नाम से जानी जाने लगी।
अक्साई चिन छुड़ाने का समय
लद्दाख के सांसद जाम्यांग सेरिंग नामग्याल ने कहा है कि एलओसी के उस पार जिस तरह से पीओके कहलाता है, एलएसी के पार अक्साई चिन भी चीन के कब्जे वाला लद्दाख कहलाया जाना चाहिए। सांसद ने कहा कि वर्ष 1962 के युद्ध में चीन ने 37,244 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के लद्दाख को कब्जा लिया।
अक्साई चिन असल में चीन के कब्जे वाला लद्दाख है, जिसे वापस लेने का समय आ गया है। सांसद ने कहा कि पुलवामा हमले के बाद देशभर में जो जज्बात थे, वैसे ही गलवां घाटी की घटना के बाद भी हैं। ऐसे में चीन को करारा जवाब देने के लिए केंद्र की मंशा को लेकर किसी में कोई शंका नहीं होनी चाहिए। चीन के कब्जे वाला इलाका असल में चरवाहों की लाइफलाइन हैं। इसे छुड़ाना मुश्किल जरूर है लेकिन नामुमकिन नहीं।
दशकों से नई एलएसी बनाता आ रहा चीन, अब खदेड़ने का वक्त
एलएसी पर इन दिनों हालात बेहद तनावपूर्ण हैं। लद्दाखियों की नजर में चीन दशकों से जमीन हड़प रहा है और जमीनी स्तर पर नई एलएसी बना चुका है। लद्दाखियों को उम्मीद है कि तनाव के बीच गलतियों की समीक्षा कर चीन को एलएसी से पीछे धकेला जाएगा।
लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के पूर्व अध्यक्ष रिग्जिन स्पलबार के अनुसार 1962 से एलएसी एकदम बदल चुकी है। साठ वर्षों में केंद्र की नीति ढुलमुल रही है। कमजोरी का फायदा उठाकर चीन हर साल नई एलएसी बनाने की फिराक में रहा। इस बार कब्जाए गए इलाकाें से चीन को पीछे धकेलना होगा। एक अन्य प्रतिनिधि ने कहा, जमीन वापस लेने के लिए ठोस कार्रवाई जरूरी है।
एलएसी पर तिब्बती चरवाहे बसा रहा ड्रैगन
लद्दाखियों के अनुसार चीन ने तिब्बती चरवाहों के लिए तमाम तरह की सुविधाएं दे रखी हैं। वह चरवाहों को इस्तेमाल करता है, जबकि एलएसी के इस पार चरवाहों को न तो सुविधाएं मिलती हैं और न ही इन्हें एलएसी पर जाने दिया जाता है। इस तरफ के चरवाहों को भी अग्रिम रक्षा पंक्ति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।