अनकही कहानियों की जुबानी: घर-आंगन की चीखें अब सुनाई दे रही मुस्कान में… गण के साथ आया तंत्र तो भरने लगे जख्म
बरसों तक 90 के दशक के आतंक और उपेक्षा से पीड़ित परिवारों को 2025 में गण और तंत्र के सहयोग से न्याय और राहत मिली। अब उनके जख्मों पर मरहम लगा, धूल भरी फाइलों में जान लौट आई और उम्मीद की नई सुबह आई।
विस्तार
90 का दशक याद कीजिए...। आतंक के उस दौर ने गहरे जख्म दिए। खरोंचे दीं। आंसू दिए...। परिंदों से उनके ख्वाब छीने...। खुला आसमान भी छीन लिया...। नफरती लोगों ने साजिशें रचीं। अलगाव की साजिशें। इन साजिशों के तार गहरे थे। इतने गहरे कि नायक-खलनायक की नई परिभाषाएं गढ़ दी गईं। जो आतंक का विरोधी वो खलनायक...। इसी परिभाषा का ही असर था कि जो आतंक के विरोध में आया या उसके खिलाफ जुबां खोली उन्हें मार दिया गया। खून से सनी गलियां, घर-आंगन चीखते रहे। जवाब मांगते रहे...। न्याय के लिए चौखट पर दर-दर भटकते रहे। अनसुनी फरियाद वाली सिसकियां गले में ही घुट गईं। जख्म नासूर बन गए। यादों में टीसते, टपकते जख्म लिए आखिर खामोश जिंदगी चलती रही। वक्त का पहिया घूमा। 2025 में गण को तंत्र का साथ मिला तो जख्मों पर मरहम लगने लगे। धूल पड़ी फाइलों में जान आ गई। वो दौड़ पड़ीं नई सुबह का नया पैगाम लेकर। मुद्दतों बाद वे मुस्कुराए तो आंखें छलक पड़ीं। भरोसे की जमीन पर मजबूती से पांव जमा रहे आतंक पीड़ित ऐसे परिवारों की कहानी उन्हीं की जुबानी बता रही हैं रोली खन्ना
दहशतगर्दों को नहीं पसंद थी भाई की अमनपरस्ती...इसलिए उन्होंने मार डाला
'डाॅ. अजहर, सीएमओ शिरीन'
मेरा बड़े भाई डाॅ. अर्जुमन युवाओं को नशे से दूर ले जाने की कोशिश कर रहे थे। आतंकी युवाओं को नशा थमाकर अपने साथ ले जाने के पुरजोर कोशिश कर रहे थे। भाई सेना के साथ मिलकर एक सेंटर चला रहे थे। वे कभी जमात-ए-इस्लामी के विरोध में रैलियां निकालते तो कभी विरोध में युवाओं को इकट्ठा करते। उनका एक-एक लफ्ज इतना असर डालता कि युवा जमात-ए-इस्लामी के विरोध के लिए उनके पीछे हो लेते थे। यह सबकुछ आतंकियों को पसंद नहीं था। 30 मार्च 2019 का दिन था। वे अपने एनजीओ के दफ्तर में बैठे थे तभी आतंकियों ने उनकी जान ले ली।
मेरी भाभी मसरल नीलोफर और उनके दो बच्चों के सिर से आसरा छिन गया। हमने इनकी मदद के लिए हर दरवाजा खटखटाया। न्याय तो दूर, हमारा हाल लेने वाला भी कोई नहीं था। सभी के आंखों के आंसू सूख चुके थे। अचानक एक दिन नई उम्मीद जगी और भाभी को नौकरी मिली। उनका एक बेटा नीट की तैयारी कर रहा है और दूसरे ने हाल ही में दसवीं पास की है। भाभी कहती हैं कि अब उन्हें किसी पर निर्भर नहीं रहना होगा।
हर निवाले के साथ बहते थे आंसू, छोटा बेटा कमाने निकला तो दिल को सुकून मिला
'अली मोहम्मद, बारामुला'
नहीं भूलती 30 अप्रैल 2018 की वह तारीख...। आतंकियों ने हमारे बेटे इरफान अहमद शेख आसिफी को हमसे छीन लिया। 22-23 साल की उम्र थी उसकी...। कपड़ों की फेरी लगाता था। उड़ी तक जाता था कपड़े बेचने...। उस शाम को भी वह हर रोज की तरह लौट रहा था। खानपुर ब्रिज के पास उसे दो दोस्त मिल गए। वे उससे कुछ खिलाने की जिद करने लगे। दोस्तों की जिद पर वो रुका, उसी दौरान लश्कर-ए-ताइबा के आतंकियों ने अंधाधुंध गोलियां बरसाईं...। इतना कहते-कहते अली की आवाज भर्रा गई। सिसकियां बढ़ती गईं मानो किसी ने दिल के गहरे जख्मों को फिर से छेड़ दिया हो। कुछ देर बाद संभलते हुए बोले, हमें तो पता ही नहीं चलता, किसी ने सोशल मीडिया पर इस घटना के बारे में डाला था। हमारी दुनिया उसी वक्त खत्म हो गई।
हर निवाले के साथ आह और आंसू निकलते थे। हमारे दुखों को सुनना तो दूर कोई दुख-दर्द बांटने भी नहीं आया। हमें कोई उम्मीद भी नहीं थी...। अचानक एक दिन हमारे नसीब जागे। हमारे छोटे बेटे उमर अली शेख आसिफी के साथ हमें उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के पास से संदेशा आया। उसे नौकरी मिली। आज जब उमर खुदा हाफिज कर काम पर जाता है तो दुआ यही निकलती है कि बेटा किसी का भी हो आतंकी हमले से महफूज रहे। हमारे परिवार के लिए जो कुछ किया गया हम दिल से उसका शुक्रिया करते हैं।
पिता को आतंकी ले गए, मां को दूसरी शादी करनी पड़ी...24 साल बाद मुझ अनाथ को मिली पहचान
'जुनैद अहमद सेह, अनंतनाग'
अनंतनाग के वेरीनाग को पर्यटन स्थल के साथ ही शांत और आध्यात्मिक वातावरण के लिए जाना जाता है। जम्मू-कश्मीर के इस इलाके में कई परिवार हैं जो आतंकवाद की त्रासदी झेल रहे हैं। इन्हीं में से एक मैं हूं। 1999 का दौर ऐसा था कि आतंकी आते थे और जिसे चाहे उठा ले जाते थे। उनके ग्रुप में शामिल न होने पर वे मार डालते थे। मेरी मां और घर के लोगों ने बताया कि जब मैं दो साल का रहा होगा...मेरी बहन तो महज 40 दिन की ही थी...।
मेरे पिता नजीर अहमद टेलर थे। उन्हें भी उठा ले गए और मार डाला। मां के सिर पर कोई हाथ नहीं था, उन्होंने दूसरी शादी कर ली। इसके बाद मेरा और बहन के दिन रात सड़कों पर गुजरे। कुल मिलाकर दर्द ने मुझे पाला...। मैंने पढ़ाई का रास्ता चुना। कई रातें रास्तों पर सोकर बिताईं। दो-दो महीने हो जाते घर आए। खाना मिलता तो खा लेता। हमें समाज में सम्मान मिले... इसकी लड़ाई लड़ी है हमने। कई ताने सुने हमने।
खुद के लिए तो सुन सकता था, बहन के लिए नहीं। उसकी 18 साल की उम्र में शादी कर दी, पर हमारे सामने पहचान का संकट था। अगस्त 2025 में मुझे रोड्स एंड बिल्डिंग विभाग के अकाउंट सेक्शन में नौकरी मिली। कश्मीर में हर मुसलमान आतंकी नहीं। कुल मिलाकर कहूं तो मेरा सम्मान इस नौकरी से लौटा है।
मेरे भाई को छीन लिया, हर पल दहशत रहती है...उम्मीद है बहुत कुछ बदलेगा
'सना, बारामुला'
उस वक्त मेरा भाई हसीब नबी खान यही कोई 19 साल का था। ओल्ड टाउन में हमारे घर के बिल्कुल करीब 30 अप्रैल 2018 को उसे आतंकियों ने मार डाला। आतंकवाद चरम पर था। मेरे दादू और परिवार ने आतंकी गतिविधियों का विरोध किया। इसको लेकर कई बार घर पर बैठकें भी होती थी। यही खुन्नस थी। हसीब दही लेने गया था, पर आई उसकी मौत की खबर। हम सब जिंदगी जी रहे हैं पर दहशत में। जो गया उसकी भरपाई नहीं हो सकती। छोटे भाई को नौकरी मिली है तो मां-पापा गुलाम नबी खान और शमीमा बेगम के लिए ये बदलाव अच्छे हैं। उनको लगता है कि आने वाले समय में उनके बाकी बच्चों की देखभाल होगी, उनके बच्चे सुरक्षित रहेंगे।
मेरी मां ने वो सहा जो एक अकेली औरत को सहना पड़ता है...खुशियों ने ढूंढ लिया मेरे घर का पता
'यास्मीना, हपतनार, अनंतनाग'
अनंतनाग का हपतनार कई हत्याओं का गवाह रहा है। हमारी गलियां खौफ की चादर ओढ़े रहती थीं। 17 जुलाई 2002 की बात है, मेरी मम्मा कहती हैं कि तब मैं तीन साल की थी। मेरी एक छोटी बहन भी पैदा हो चुकी थी। पापा पावर हाउस में ड्यूटी दे रहे थे, वे एसपीओ थे। बारूदी सुरंग फटी और उनकी जान चली गई। दहशत के साए में बड़ी हुई। मम्मा ने तो चुप्पी ओढ़ ली।
अकेली औरत और दो बेटियां... कितना कुछ सहना पड़ता है। उस संघर्ष और पीड़ा को शब्दों में बयां नहीं कर सकते। हमने तो मान लिया था कि हमारी जिंदगी इसी ढर्रे पर चलेगी। आखिर खुशियों को भी हमारे घर का पता मिल गया। महज दो से तीन महीने की कवायद हुई और हमारे हाथ में नौकरी का लेटर आ गया। पापा के जाने का दुख न तो हम भूल पाएंगे न मेरी मम्मा। पर मम्मा को सुकून है कि जिस स्टेट में हम रहते हैं, वहां उनके बच्चों के साथ अब वो नहीं होगा जो पति के साथ हुआ।
हम पिकनिक से लौट रहे थे, बीच रास्ते से पापा को ले गए, अगले दिन लाश मिली
'यासीर शकील, अनंतनाग'
शकील अहमद बख्त नाम था मेरे पापा का। 2004 में उनको आतंकवादियों ने मार डाला। पिता एसपीओ थे। हम हापतनार में रहते हैं। यह अनंतनाग का बहुत खूबसूरत इलाका है। मैं तो छोटा था, जो भी सुना लोगों से सुना और मम्मी ने सुनाया। मम्मी ने बताया कि वह हमारी आखिरी पिकनिक थी। लौटते वक्त कुछ आतंकवादियों ने बस रोकी और पिता को उतार लिया। वे उनसे वर्दी छोड़कर आतंकवादी बनने को कह रहे थे। पापा नहीं माने तो अगले दिन उनकी लाश मिली। मां बताती हैं कि हमें भी उन दिनों छिप कर रहना पड़ता था। अब मैं गाड़ी चलाकर घर चला रहा हूं। गुजर-बसर हो जाती है, पर लगता है कि हमें हमारा हक मिलना चाहिए। हमारा नियुक्ति पत्र भी मिलेगा, उपराज्यपाल ने भरोसा दिया है। हम उस घड़ी का इंतजार कर रहे हैं।
पापा को वे आतंकी बनाना चाहते थे, नहीं माने तो मार डाला
मां की दूसरी शादी हो गई...चाचा का घर ही ससुराल बन गया
'कुलसुमा और अब्दुल मजीद खान, अनंतनाग'
मेरा नाम कुलसुमा है। जब मेरे पापा फारूक अहमद खान (19 वर्ष) को आतंकी उठाकर ले गए थे, मैं कुछ ही दिन की थी,। वे पापा को आतंकवादी बनाना चाहते थे, पापा ने विरोध किया तो उन्होंने मार कर फेंक दिया। भर्राए गले से कुलसुमा कहती हैं, चाचा-चाची ने मुझे यह सबकुछ बताया था। मां की दूसरी शादी हो गई। चाचा के परिवार ने मुझे पाला और बड़ा किया, फिर चाचा के बेटे से ही मेरा निकाह हुआ। मजीद खान कहते हैं कि महज 19 साल का था मेरा भाई।
आतंक के रास्ते पर चलने से इन्कार करना ही आतंकियों की नजर में उसका गुनाह था। बरसों हम दहशत में जिए हैं। हम लोग कुछ कह नहीं सकते थे, सिसक नहीं सकते थे। एक दिन किस्मत मेहरबान होगी, हमें इसका यकीन है। आतंकवाद पीड़ित परिवारों को उपराज्यपाल की ओर से राहत दी जा रही है। हमें भी पता चला है कि लोगों को महज एक महीने के भीतर नियुक्ति पत्र मिल गए। हमें भी इतंजार है कि हमारे घर भी ये खुशियां आएं। बेटी-बहू के दस्तावेज तैयार करके रखा है।
पापा-भाई को मारा...मेरी आंख की रोशनी छीन ली, घर जला दिया और जमीन भी हड़प ली
'जुनैद अहमद जोथर, बटकुट, पहलगाम'
साल 1999 की बात है। पहले मेरे पापा मोहम्मद सादिक को बुलाया और सिर पर गोली मार दी। मैं उनके पीछे गया तो मुझे लात से इस तरह मारा कि मेरी एक आंख की रोशनी चली गई। उस दिन मेरे भाई गुलाम जिलानी को दावत के बहाने बुलाया और पूरी मैग्जीन उसके सीने से सटाकर खाली कर दी।
भाई एसपीओ था, वे उसे आतंकी बनाना चाहते थे। मना किया तो मौत मिली। उन्होंने हमारा घर फूंक दिया और जमीन हड़प ली। मां ने किसी तरह से हम चार भाइयों के जवान होने तक घर का खर्च चलाया। मां ने कभी किसी के घर बर्तन मांजे तो कभी मजदूरी की...। इस बीच एक भाई ने और फौज की नौकरी जॉइन की। उस पर हमला हो गया। मम्मी ने कहा कि नौकरी नहीं करनी है। इस वक्त चारों तरफ बर्फबारी हो रही है और हमारा परिवार टेंट में रह रहा है। घर-जमीन सब आतंकी परिवारों ने कब्जा ली। बीते दिनों उपराज्यपाल से हमारी मुलाकात हुई थी। आश्वासन मिला है कि आतंकवाद पीड़ित परिवारों को मदद मिलेगी।