कश्मीर में फिर शेख अब्दुल्ला के भरोसे नेशनल कान्फ्रेंस
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कहते हैं कि वर्तमान की बुनियाद हिलती है तो हर शख्स और संस्था अतीत में झांकती नजर आती है। नेशनल कांफ्रेंस भी अब अतीत के गौरव को भुनाने की कोशिश में जुटी है। इसलिए शेख अब्दुल्ला की तस्वीरों का इस्तेमाल हो रहा है। नेकां के चुनावी पोस्टरों में पहले शेख अब्दुल्ला नजर आते हैं और बाद में फारूक और उमर अब्दुल्ला।
नेकां के लिए प्रथम चरण का चुनाव चुनौती है। इस चरण की अधिकांश सीटों पर नेकां और कांग्रेस का वर्चस्व रहा है। इस बार एक तरफ पीडीपी की चुनौती है तो दूसरी तरफ भाजपा ने कश्मीर घाटी से लेकर चिनाब वेली तक अपनी मौजूदगी का अहसास बड़ी शिद्दत से कराया है।
जब अपने हुए पराए
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की ईमानदार कोशिशों को लोग स्वीकारते हैं लेकिन साथ में यह कहना नहीं भूलते कि नेकां के ही खुर्राट नेताओं ने उनकी चलने नहीं दी। गठबंधन सरकार में छह साल तक हर फैसले में साझीदार रही कांग्रेस ने अब बाहें चढ़ा ली हैं। उमर को कांग्रेस का हमला भी झेलना पड़ रहा है।
किश्तवाड़ के दंगे में गृह राज्यमंत्री सज्जाद अहमद किचलू की भूमिका की ओर उंगली उठी। जांच बिठाई गई और किचलू जांच में बेदाग करार दिए गए। पहले मंत्री पद खोया और बाद में फिर हासिल कर लिया। सियासी मजबूरियों के तहत ही सही लेकिन उमर ने उन्हें फिर कुर्सी सौंपी। किश्तवाड़ में इस कुर्सी छिनने और फिर से ताजपोशी का यह वाकया चुनाव में ताजा हो गया है।
रामबन में कांग्रेस के वर्तमान विधायक अशोक कुमार को नेकां के चमनलाल से तो चुनौती मिल ही रही रही है साथ में भाजपा भी ताल ठोक रही है। मंत्री एजाज अहमद खान हों या वकार रसूल इस बार भाजपा ने सबकी राह में कठिनाई पैदा की हैं। कांग्रेस के साथ दिक्कत है कि वह छह साल तक नेकां के साथ सरकार में शामिल रही और अब विपक्ष वाले तेवर अपना लिए हैं।
आम लोगों में असमंजस है कि वह कांग्रेस को सत्ताधारी दल माने या विपक्ष। कांग्रेस के मंत्री अब्दुल माजिद वानी को डोडा में भी इस बार भाजपा से चुनौती मिल रही है। चिनाब वेली में कांग्रेस का किला हिल रहा है और घाटी में नेकां अपना आसन बचाने में जुटी है।