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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Jammu News ›   El Nino Effect: long dry spell period seen for 5th time in 50 years in Jammu and Kashmir

El Nino Effect: जम्मू-कश्मीर में 50 साल में 5वीं बार दिखा इतना लंबा सूखे का दौर, अल नीनो से बढ़ा ड्राई स्पेल

Tue, 30 Jan 2024 03:08 PM IST
kumar गुलशन कुमार अमित कुमार, जम्मू
अमित कुमार, जम्मू Published by: kumar गुलशन कुमार Updated Tue, 30 Jan 2024 03:08 PM IST
सार

ड्राई स्पेल से फसलों को नमी नहीं मिल पाई है। जम्मू संभाग के कठुआ, सांबा, जम्मू, उधमपुर, पुंछ और राजोरी बड़े पैमाने पर गेहूं का उत्पादन करते हैं। हालांकि सिंचाई वाले क्षेत्रों में 4-5 वर्षों में गेहूं का उत्पादन बढ़ा है, लेकिन इस बार ड्राई स्पेल होने से इसमें कमी आ सकती है।

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El Nino Effect: long dry spell period seen for 5th time in 50 years in Jammu and Kashmir
गुलमर्ग की 21 जनवरी और 30 जनवरी की तस्वीर - फोटो : बासित जरगर

विस्तार

जम्मू कश्मीर में करीब दो माह का लंबा सूखे का दौर रहा। 26 जनवरी को मौसम में बदलाव हुआ। अल-निनो प्रभाव की वजह से ड्राई स्पेल (सूखा) लंबा खिंचने के कारण मौसम की बेरुखी का असर खेतों से पहाड़ों तक देखा जा रहा है। जम्मू-कश्मीर में सीजनल बर्फबारी वाले पर्यटन स्थलों पर इस साल हिमपात नहीं होने के कारण दिसंबर और जनवरी में सामान्य से कई गुना कम पर्यटक पहुंचे हैं। इसका स्की, एडवेंचर सहित अन्य पर्यटन गतिविधियों पर भी असर पड़ा है। 

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सीजनल बर्फबारी से जुड़े होटल, टूर एंड ट्रैवल सहित अन्य स्थानीय कारोबार लगभग मंदा रहा है। वहीं, बारिश न होने के कारण प्रवेशद्वार लखनपुर से लेकर कश्मीर के आखिर तक सीजनल फसलें भी प्रभावित हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार अगर फरवरी के पहले सप्ताह तक बारिश नहीं होती है, तो सरसों, गेहूं और मटर की पैदावार घटेगी।
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कश्मीर के कृषि निदेशक इकबाल चौधरी के अनुसार लंबे समय बाद दिसंबर, 2023 से जनवरी, 2024 तक शुष्क मौसम देखा गया है। पहले अक्तूबर में भारी हिमपात के बाद थोड़े समय के लिए शुष्क मौसम रहता था। इससे सीजनल फसलों के लिए बारिश का पानी सिंचाई का काम कर देता था। इस मौसम में कश्मीर में सरसों, गेहूं और मटर की फसल लगाई जाती है। कश्मीर में 50 से 60 हजार हेक्टेयर भूमि पर मटर की खेती होती है। इसके लिए किसान अप्रैल से तैयारी शुरू कर देते हैं।
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जून-जुलाई में जब देश के अन्य हिस्सों में मानसून के कारण सब्जियां खत्म हो जाती हैं तब कश्मीर बड़े पैमाने पर मटर का निर्यात करता है। अब अगर फरवरी में बर्फ पड़ती भी है तो वो अधिक देर तक नहीं जमेगी। इससे पानी भी नहीं ठहर पाएगा और इसका सीधा असर इन फसलों पर होगा। कश्मीर में रबी सीजन में 5 से 7 फरवरी तक बारिश होना जरूरी है। अगर लगातार बारिश होती है, तो उससे भी नर्सरी, रोपण, मक्की लगाने में देरी हो सकती है।

जम्मू-कश्मीर में 50 साल में 5वीं बार इतना लंबा ड्राई स्पेल

मौसम विज्ञान केंद्र श्रीनगर के निदेशक डॉ. मुख्यतार अहमद के अनुसार अल-निनो एक जलवायु संबंधी बदलाव है जो पूर्वी प्रशांत महासागर में स्तरीय जल के असामान्य रूप से गर्म होने के कारण होता है। पानी के तापमान में बदलाव के कारण वातावरण का संतुलन बिगड़ता है और ड्राई स्पेल जैसी समस्या का सामना करना पड़ता है। जम्मू-कश्मीर में पहले भी लंबे ड्राई स्पेल रहे हैं, लेकिन 50 वर्षों के बीच हुए लंबे ड्राई स्पेल में से इस साल चौथी या 5वीं बार ऐसा फिर देखा गया है। दिसंबर 2003 से जनवरी 2024, दिसंबर, 2018 से जनवरी 2019, दिसंबर, 2016, जनवरी, 2015, दिसंबर, 2014, दिसंबर, 2007, दिसंबर, 2003, दिसंबर 1997, दिसंबर,1987 में मौसम लंबे समय तक शुष्क रहा था।

फरवरी पर उम्मीद, बर्फ से जुड़ी गतिविधियां करवाएंगे : निदेशक जम्मू के पर्यटन निदेशक विवेकानंद राय के अनुसार इस बार दिसंबर से जनवरी तक बर्फ नहीं गिरने से संभाग के पटनीटाप, नत्थाटाप, सनासर, भद्रवाह आदि पर्यटन स्थलों पर लोग कम पहुंचे हैं। अभी फरवरी पर उम्मीद है। बर्फ गिरने पर बर्फ से जुड़ी पर्यटन गतिविधियां करवाएंगे। वहीं, पर्यटन निदेशक कश्मीर, राजा याकूब ने दावा किया कि कश्मीर के पर्यटन पर अधिक असर नहीं देखा गया है। जनवरी में सामान्य तौर पर पर्यटक पहुंचे हैं। हालांकि बर्फ गिरने पर यह आंकड़ा बढ़ेगा।

गेहूं, सरसों आदि फसलों को दिसंबर से आगे विभिन्न चरणों में बारिश की जरूरत है, क्योंकि इस समय नहरें सिंचाई के लिए तैयार नहीं होती हैं। अगर अगले 10 से 15 दिन में पर्याप्त बारिश नहीं होती है तो सीजनल फसलों पर व्यापक असर देखने को मिलेगा। -राम सेवक, कृषि निदेशक,जम्मू

ड्राई स्पेल से फसलों को नमी नहीं मिल पाई है। जम्मू संभाग के कठुआ, सांबा, जम्मू, उधमपुर, पुंछ और राजोरी बड़े पैमाने पर गेहूं का उत्पादन करते हैं। हालांकि सिंचाई वाले क्षेत्रों में 4-5 वर्षों में गेहूं का उत्पादन बढ़ा है, लेकिन इस बार ड्राई स्पेल होने से इसमें कमी आ सकती है। -केके शर्मा, पूर्व कृषि निदेशक

आने वाले एक या दो दिनों के अंदर पश्चिमी विक्षोभ दोबारा सक्रिय हो रहा है। अनुमान है कि इससे हिमाचल प्रदेश और कश्मीर में बर्फबारी और मैदानी इलाकाें जैसे पंजाब और हरियाणा में कई जगहों पर अच्छी बारिश देखने को मिलेगी। -अजय कुमार सिंह, निदेशक, मौसम विज्ञान केंद्र, चंडीगढ़।

50 फीसदी तक गिर सकती है सेब की पैदावार

हिमाचल, कश्मीर और उत्तराखंड में बर्फबारी नहीं हो रही। सेब और अन्य गुठलीदार फलों को इससे भारी नुकसान हो सकता है। चिलिंग ऑवर पूरे न होने से इस साल सेब का उत्पादन प्रभावित होना तय है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर बर्फबारी नहीं हुई तो सेब उत्पादन 50 फीसदी तक गिर सकता है। तापमान 7 डिग्री से नीचे आने पर चिलिंग ऑवर्स शुरू होते हैं। सेब की सामान्य फसल के लिए 1000 से 1600 घंटे चिलिंग ऑवर्स की जरूरत रहती है। -देवेंद्र शर्मा, कृषि विशेषज्ञ

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