कश्मीर में आदिमानव ने मारा था दुनिया का सबसे बड़ा मैमथ
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हालांकि, उसके जीवाश्म का संपूर्ण अध्ययन होना अभी बाकी है। स्थानीय स्तर पर उसका डीएनए सैंपल लेने की कोशिश की गई लेकिन सफलता नहीं मिली। यह पंपोर के अपर करेवा की पहाड़ियों में पाया गया था। जहां मिट्टी में यह दबा पाया गया था।
वहां की सैंड की कार्बन डेटिंग नहीं हो पाई थी। उसके 55 फुट ऊपर के सैंड की कार्बन डेटिंग से यह अनुमान लगाया गया कि उसे करीब 50 हजार साल पहले मारा गया होगा।
मैमथ का कंकाल पूरी तरह जीवाश्म नहीं बना
जम्मू यूनिवर्सिटी के वाडिया म्यूजियम आफ नेचुरल हिस्ट्री में इसे सुरक्षित रखा गया है। एलिफस नेमेडिकस प्रजाति के इस मैमथ का कंकाल पूरी तरह जीवाश्म नहीं बना है।
जब इसे मारा गया उस वक्त इसकी उम्र करीब 25 साल की रही होगी। जबड़े और दांतों के कुछ हिस्से तो जीवाश्म बन गए हैं, लेकिन कई अन्य हिस्सों की हड्डियां अपने वास्तविक रूप में हैं।
अब तक प्राप्त जियोलोजिकल रिकार्ड के मुताबिक इसकी खोपड़ी का साइज दुनिया भर में मिले मैमथ के अन्य जीवाश्मों की खोपड़ी की तुलना में 62 प्रतिशत बड़ा है। इसलिए यह दावा किया जा किया जा रहा है कि प्रागैतिहासिक काल में धरती पर पाए जाने वाले मैमथ के सापेक्ष घाटी के मैमथ सबसे बड़े थे।
जीवाश्म के साथ पत्थरों के 63 औजार भी मिले हैं। हालांकि, इन औजारों पर इसके रक्त के कोई निशान नहीं पाए गए, लेकिन उसकी हड्डियों पर कट के निशान में औजारों के नोक बिल्कुल फिट बैठते हैं। इससे यह साबित होता है कि इन औजारों का उपयोग उसे मारने के लिए किया गया होगा।
कट के निशान उसके पैरों और सिर पर भी मिले हैं। म्यूजियम में सिर्फ खोपड़ी को रखा गया है। शेष हिस्से को क्षरण के कारण सील कर सुरक्षित रखा गया है ताकि वह खराब न हो।
क्या है मैमथ
मैमथ हाथी की एक प्रजाति थी, जो दुनिया से विलुप्त हो चुकी है। इसका प्रवास ठंड वाले इलाके थे। इसीलिए इसके शरीर पर लंबे और घने बाल पाए जाते थे। रूस समेत दुनिया के कुछ अन्य हिस्सों में भी इसके जीवाश्म पाए गए हैं।
इस मैमथ की हत्या में प्रयुक्त पत्थरों के औजारों से साबित होता है कि कश्मीर में करीब 50 हजार साल पहले मानव सभ्यता अच्छी तरह फलफूल रही थी।
हालांकि मनुष्यों के अवशेष अब तक नहीं मिले हैं। देश में प्रागैतिहासिक काल में मानव द्वारा द्वारा प्रयोग किए गए पत्थरों के औजार तो कई स्थानों पर मिले हैं, लेकिन मनुष्य के अवशेष सिर्फ नर्मदा घाटी में ही मिले हैं।
पैरों की हड्डियों से सीढ़ियां बना लीं
रेलवे विभाग कुछ निर्माण कार्य के लिए खोदाई कराकर मिट्टी उठवा रहा था, तभी 31 अगस्त 2000 को सोपोर गर्वनमेंट डिग्री कालेज बीएससी तृतीय वर्ष के छात्र फैयाज अहमद ने इसे देखा। उसने इसकी जानकारी अपने शिक्षकों एबी माजिद और मोहम्मद शफी लोन को दी।
उन्होंने कश्मीर यूनिवर्सिटी जियोलोजी विभाग के तत्कालीन रीडर प्रोफेसर जीएम भट (अब जम्मू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर) को मौके पर ले जाकर इसे दिखाया।
तब से प्रोफेसर भट इसके संरक्षण में लग गए, लेकिन कोई उपाय नहीं होने पर यह 2009 तक वहीं पड़ा रहा। 2009 में इसे वहां से उठा कर सील किया गया, लेकिन समस्या यह थी कि इसे कहां संरक्षित रखा जाए। अंतत: 2013 में इसे खोलकर वाडिया म्यूजियम आफ नेचुरल हिस्ट्री में रखा गया।
वहीं पास में सड़क के किनारे चाय की दुकान करने वाले एक व्यक्ति ने इसके दो पैरों की हड्डियों को दुकान में आने जाने के लिए सीढ़ियां बना लीं। 2009 में पैरों की हड्डियों को वहां से निकाला गया।