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वैद्य नगरी के हर घर में वैद्यराज का वास

Fri, 01 May 2015 12:16 PM IST
चंद्र प्रकाश/बसोहली
चंद्र प्रकाश/बसोहली Updated Fri, 01 May 2015 12:16 PM IST
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doctor in all house in Basohali
रियासत में प्राचीन काल से बसोहली ऐसा नगर रहा है, जहां न सिर्फ कला फली-फूली वरन, इसने औषधि विद्यान के क्षेत्र में भी खूब नाम कमाया। एक समय ऐसा था, जबकि इसे वैद्य नगरी का दर्जा हासिल था। इसके साथ ही बसोहली पेंटिंग की अंतराष्ट्रीय ख्याति के चलते इसे कलानगरी के रूप में ख्याति मिली। पश्मीना की वजह से भी इस कसबे के हुनरमंद कारीगरों ने खूब नाम कमाया।
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स्थानीय लोगों के अनुसार अनुभवी वैद्यों से उपचार और परामर्श के लिए आज भी दूर-दूर से लोग यहां पहुंचते हैं। जटिल से जटिल रोगों के इलाज के लिए विख्यात इन वैद्यों के पास न सिर्फ ग्रामीण, बल्कि शहरी मरीजों का भी तांता लगा रहता था। वर्तमान में बसोहली में यह परंपरा कहीं पिछड़ सी गई है।
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बसोहली की इस कला को बचाए रखने के लिए औषधीय पौधों का बड़े पैमाने पर रोपण समय की मांग है, लेकिन ऐसा न होने से यह कला विलुप्त सी होती जा रही है। पाधा परिवार बसोहली में इस परंपरा से जुड़कर औषधि और जीवन रक्षक दवाओं को तैयार करने में आज भी जुटा है।
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स्थानीय निवासी शिव कुमार पाधा ने बताया कि कसबे के स्व. कुंजलाल पाधा रुचीकरण चूर्ण, बसंत माल्ती और सर्पमुखी अंजन के लिए विख्यात रहे हैं। कसबे का वालिया परिवार जलने पर इस्तेमाल में लाई जाने वाली मलहम के लिए विख्यात रहा है।

ऐसे ही सोनी परिवार नेत्र रोेगों, चौहान परिवार सर्पदंश, मखोत्रा परिवार बिच्छू दंश, सराफ परिवार मिश्री के साथ अनुपम ईसबगोल, जो कि पेचिस और डायरिया में दिया जाता है, के लिए विख्यात रहा है। इनकी खासियत रही है कि ये परिवार नि:शुल्क उपचार करते रहे हैं।

कई परिवार कैंसर के गारंटेड इलाज और घावों के उपचार के लिए भी जाने जाते हैं। कुछ परिवार मंत्र चिकित्सा से पुराने माइग्रेन, चर्म रोग, खसरा, चेचक आदि का भी इलाज करते हैं। स्थानीय लोगों की मांग है कि हर घर में फार्मेसी और कसबे में आयुर्वेद रिसर्च सेंटर खोला जाना चाहिए।


इससे न सिर्फ इस विधा को बढ़ाने में मदद मिलेगी, वरन पहाड़ी इलाकों में जड़ी-बूटियों की खेती को भी बढ़ावा मिलेगा। सरकार के इस कदम से रियासत के बेरोजगार युवकों को भी रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे।
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