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Jammu News: निष्कासन दिवस पर छलका कश्मीरी पंडितों का दर्द और आक्रोश

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displacement day
बोले-सुरक्षित और सम्मानजनक घर वापसी चाहिए, आज उपराज्यपाल से मिलेंगे
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जम्मू। अष्टभैरव जगदंबा महायज्ञ के चौथे दिन कश्मीरी विस्थापितों ने शनिवार को 36 वर्ष पहले हुए सामूहिक नरसंहार की पीड़ा को याद किया। जगती नगरोटा प्रवासी शिविर में निष्कासन दिवस पर बड़ी संख्या में कश्मीरी समुदाय के लोग, महिलाएं, युवा व संत समाज के प्रतिनिधि एकत्रित हुए। समुदाय ने न्यायपूर्ण, सुरक्षित और सम्मानजनक घर वापसी की दीर्घकालिक मांग को दोहराया।
यूथ फॉर पनुन कश्मीर ने विस्थापित कश्मीरी पंडितों के सांविधानिक पुनर्वास, सुरक्षित वापसी, पनुन कश्मीर (होमलैंड) की स्थापना, सुरक्षा ढांचा, सामाजिक-आर्थिक पुनर्स्थापन और पीढ़ीगत क्षति की भरपाई संबंधी मांगों को प्रस्तुत किया। संस्था का कहना है कि पुनर्वास दया नहीं, बल्कि न्याय और राज्य की सांविधानिक जिम्मेदारी का विषय है। आयोजन स्थल पर शाम को एडीसी अनसूया जम्वाल ने पहुंचकर दर्द और मांगों को सुना। उन्होंने कहा कि समस्याओं और संवेदनाओं को उचित स्तर पर उठाया जाएगा। साथ ही मंगलवार को कश्मीरी पंडितों के प्रतिनिधिमंडल को उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से मिलवाने का आश्वासन दिया।
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प्रदर्शनी में बर्बरता और इतिहास के कड़वे अनुभव किए महसूस
धार्मिक अनुष्ठान, हवन और पूजा-अर्चना की परंपरा चलती रही। आयोजन स्थल पर दिनभर लोगों की आवाजाही बनी रही। प्रदर्शनी में नरसंहार और निष्कासन के चित्र प्रदर्शित किए गए, जिन्हें देखकर युवाओं ने बर्बरता और इतिहास के कड़वे अनुभव को महसूस किया। समुदाय के लोगों ने पारंपरिक गीत प्रस्तुत कर पलायन और प्रत्यावर्तन के भाव को व्यक्त किया। यूथ फॉर पनुन कश्मीर के अध्यक्ष विट्ठल चौधरी का कहना है कि विस्थापितों की मांगें आज भी अपूर्ण और अनसुलझी हैं। समुदाय का संघर्ष सुरक्षित और स्थायी घर वापसी तक जारी रहेगा।
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ओवरएज युवाओं को मिले मौका
कश्मीरी युवा अजय के अनुसार अलग होमलैंड की मांग के साथ मजबूती से खड़े हैं। हालांकि उनका यह भी कहना है कि यदि सरकार इंसाफ दे तो पूरा दे। अजय ने ओवरएज हो चुके युवाओं के लिए रोजगार नीति और अवसर की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि 2008 में घोषित छह हजार पदों के विशेष जॉब पैकेज में आज तक विस्थापित कश्मीरी पंडित युवाओं की पूरी नियुक्तियां नहीं हो पाई हैं। जिमी का कहना है कि सरकार को घर वापसी की बात के साथ पूरी सुरक्षा देनी चाहिए। पिछले वर्षों में कश्मीरी कर्मचारियों के साथ जो बर्बरता हुई है, उसे देखते हुए बिना सुरक्षा के घर वापसी संभव नहीं हो सकती। अतुल पंडिता के अनुसार घर वापसी का मतलब केवल एक से दूसरी जगह जाना नहीं है। वहां नौकरियां, व्यापार के अवसर और इंफ्रास्ट्रक्चर भी होना चाहिए
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