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Jammu News: वर्ष 2014 से पहले 13 विनाशकारी बाढ़ झेल चुका है जम्मू-कश्मीर
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-वर्ष 2014 की बाढ़ में 10 लाख से ज्यादा लोग हुए थे विस्थापित, तीन हजार से ज्यादा गांव जलमग्न
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। तवी नदी के रौद्र रूप को देखकर प्रदेश के ज्यादातर लोगों के दिमाग में वर्ष 2014 की बाढ़ की कड़वी यावें ताजा हो गई हैं। उस साल जम्मू-कश्मीर में बाढ़ के प्रकोप से तीन से सात सितंबर तक 10 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए थे और तीन हजार से ज्यादा गांव जलमग्न हो गए थे।
एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एसोचैम) ने तब बाढ़ से शुरुआती नुकसान का आकलन लगभग 5,700 करोड़ रुपये का किया था। हालांकि, क्लस्टर विश्वविद्यालय के एक शोध में ऐतिहासिक अभिलेखों के हवाले से बताया गया है कि कश्मीर घाटी में 2014 से पहले 13 विनाशकारी बाढ़ आ चुकी थीं। 1841 से शुरू होकर 2014 से पहले तक की उन बाढ़ में जान-माल का जबरदस्त नुकसान हुआ था।
क्लस्टर विश्वविद्यालय, श्रीनगर के शोधकर्ता इशफाक हुसैन मलिक ने अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एस नजरूल इस्लाम हाशमी के साथ मिलकर इस शोध को अंजाम दिया था, जो वर्ष 2021 में प्रकाशित हुआ। द ग्रेट फ्लड एंड इट्स ऑफ्टरमैथ इन कश्मीर नामक शोध में बताया गया कि वर्ष 1841 से लेकर 1893, 1903, 1929, 1948, 1950, 1957, 1959, 1992, 1996, 2002, 2006, 2010 और वर्ष 2014 में कश्मीर ने बाढ़ का दुष्प्रभाव झेला। अंतरराष्ट्रीय आपदा डेटाबेस ईएम-डीएटी ने वर्ष 2014 की बाढ़ को देश के इतिहास की सबसे महंगी प्राकृतिक आपदा करार दिया था।
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शोध में भौगोलिक स्थिति, जलवायु और भूवैज्ञानिक संरचना के कारण कश्मीर घाटी को सभी प्रकार के खतरों के प्रति संवेदनशील करार दिया गया था। हिमालयी क्षेत्र में बार-बार आने वाली बाढ़, भूकंप, हिमस्खलन और अन्य जल-मौसम संबंधी आपदाओं को कश्मीर घाटी को भारी जनहानि और संपत्ति के नुकसान नी वजह बताया गया था। शोध में कहा गया कि खास तौर पर जम्मू और कश्मीर में वर्ष 2014 की बाढ़ ने बुनियादी ढांचे को ध्वस्त करने के सािा ही सामाजिक व्यवस्था को भी गंभीर रूप से प्रभावित किया। लोगों में दहशत पैदा की। अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया और पर्यावरण एवं पारिस्थितिक संतुलन को बिगाड़ने का काम किया।
इस वजह से बाढ़ का जोखिम बढ़ने का अनुमान
आज से चार साल पहले हुए इस शोध में अनुमान लगाया गया था कि भूमि उपयोग में तेजी से आ रहा बदलाव जलवायु परिवर्तन के साथ मिलकर संभावित रूप से बाढ़ के जोखिम को बढ़ा सकता है। इसका बुनियादी ढांचे पर हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है। इसके साथ ही अरब सागर से नमी के संवहन के कारण वर्षा में वृद्धि हो सकती है। आज वैज्ञानिक बार-बार बादल फटने और अधिक वर्षा के लिए जलवायु परिवर्तन को ही दोषी ठहरा रहे हैं।
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अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। तवी नदी के रौद्र रूप को देखकर प्रदेश के ज्यादातर लोगों के दिमाग में वर्ष 2014 की बाढ़ की कड़वी यावें ताजा हो गई हैं। उस साल जम्मू-कश्मीर में बाढ़ के प्रकोप से तीन से सात सितंबर तक 10 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए थे और तीन हजार से ज्यादा गांव जलमग्न हो गए थे।
एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एसोचैम) ने तब बाढ़ से शुरुआती नुकसान का आकलन लगभग 5,700 करोड़ रुपये का किया था। हालांकि, क्लस्टर विश्वविद्यालय के एक शोध में ऐतिहासिक अभिलेखों के हवाले से बताया गया है कि कश्मीर घाटी में 2014 से पहले 13 विनाशकारी बाढ़ आ चुकी थीं। 1841 से शुरू होकर 2014 से पहले तक की उन बाढ़ में जान-माल का जबरदस्त नुकसान हुआ था।
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क्लस्टर विश्वविद्यालय, श्रीनगर के शोधकर्ता इशफाक हुसैन मलिक ने अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एस नजरूल इस्लाम हाशमी के साथ मिलकर इस शोध को अंजाम दिया था, जो वर्ष 2021 में प्रकाशित हुआ। द ग्रेट फ्लड एंड इट्स ऑफ्टरमैथ इन कश्मीर नामक शोध में बताया गया कि वर्ष 1841 से लेकर 1893, 1903, 1929, 1948, 1950, 1957, 1959, 1992, 1996, 2002, 2006, 2010 और वर्ष 2014 में कश्मीर ने बाढ़ का दुष्प्रभाव झेला। अंतरराष्ट्रीय आपदा डेटाबेस ईएम-डीएटी ने वर्ष 2014 की बाढ़ को देश के इतिहास की सबसे महंगी प्राकृतिक आपदा करार दिया था।
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शोध में भौगोलिक स्थिति, जलवायु और भूवैज्ञानिक संरचना के कारण कश्मीर घाटी को सभी प्रकार के खतरों के प्रति संवेदनशील करार दिया गया था। हिमालयी क्षेत्र में बार-बार आने वाली बाढ़, भूकंप, हिमस्खलन और अन्य जल-मौसम संबंधी आपदाओं को कश्मीर घाटी को भारी जनहानि और संपत्ति के नुकसान नी वजह बताया गया था। शोध में कहा गया कि खास तौर पर जम्मू और कश्मीर में वर्ष 2014 की बाढ़ ने बुनियादी ढांचे को ध्वस्त करने के सािा ही सामाजिक व्यवस्था को भी गंभीर रूप से प्रभावित किया। लोगों में दहशत पैदा की। अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया और पर्यावरण एवं पारिस्थितिक संतुलन को बिगाड़ने का काम किया।
इस वजह से बाढ़ का जोखिम बढ़ने का अनुमान
आज से चार साल पहले हुए इस शोध में अनुमान लगाया गया था कि भूमि उपयोग में तेजी से आ रहा बदलाव जलवायु परिवर्तन के साथ मिलकर संभावित रूप से बाढ़ के जोखिम को बढ़ा सकता है। इसका बुनियादी ढांचे पर हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है। इसके साथ ही अरब सागर से नमी के संवहन के कारण वर्षा में वृद्धि हो सकती है। आज वैज्ञानिक बार-बार बादल फटने और अधिक वर्षा के लिए जलवायु परिवर्तन को ही दोषी ठहरा रहे हैं।