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Jammu News: हत्या की कोशिश के 17 साल पुराने मामले में सजा रद्द
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हाईकोर्ट ने कहा - अभियोजन पक्ष मामले में दोष साबित करने में नाकाम रहा
खुद घायल ने आरोपी को हमलावर के तौर पर नहीं पहचाना, चश्मदीद के बयान भी उलटे
जम्मू। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने हत्या की कोशिश के एक मामले में आरोपी को शक का फायदा देते हुए सजा पलट दी। वर्ष 2004 में हुए मामले में 2009 में आरोपी को दोषी ठहराते हुए जुर्माने के साथ तीन साल की सजा सुनाई गई थी। अदालत ने कहा, अभियोजन पक्ष दोष साबित करने में नाकाम रहा। जस्टिस संजय परिहार ने क्रिमिनल अपील को मंजूरी देते हुए सेशंस जज उधमपुर की अपीलकर्ता रवि कुमार को रणबीर पीनल कोड की धारा 307 और 341 के तहत दी गई सजा को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने पाया कि मामले के सबसे अहम गवाह खुद घायल ने आरोपी को हमलावर के तौर पर नहीं पहचाना। अकेले चश्मदीद (घायल की पत्नी) की गवाही में भी कई बातें विरोधाभासी थीं। एफआईआर में चोरी का आरोप भी गलत था। मामले में कई गवाह बयान से पलट गए वहीं, हथियार की बरामदगी भी कानून के हिसाब से साबित नहीं हुई। अदालत ने कहा कि मेडिकल सबूत बेशक चोटों को साबित करते हैं लेकिन वे हमलावर की पहचान के सबूत नहीं। शक चाहे कितना भी मजबूत हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता के स्थापित सिद्धांत पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने माना कि अपील करने वाला शक का लाभ पाने का हकदार था और उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया। जेएनएफ
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खुद घायल ने आरोपी को हमलावर के तौर पर नहीं पहचाना, चश्मदीद के बयान भी उलटे
जम्मू। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने हत्या की कोशिश के एक मामले में आरोपी को शक का फायदा देते हुए सजा पलट दी। वर्ष 2004 में हुए मामले में 2009 में आरोपी को दोषी ठहराते हुए जुर्माने के साथ तीन साल की सजा सुनाई गई थी। अदालत ने कहा, अभियोजन पक्ष दोष साबित करने में नाकाम रहा। जस्टिस संजय परिहार ने क्रिमिनल अपील को मंजूरी देते हुए सेशंस जज उधमपुर की अपीलकर्ता रवि कुमार को रणबीर पीनल कोड की धारा 307 और 341 के तहत दी गई सजा को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने पाया कि मामले के सबसे अहम गवाह खुद घायल ने आरोपी को हमलावर के तौर पर नहीं पहचाना। अकेले चश्मदीद (घायल की पत्नी) की गवाही में भी कई बातें विरोधाभासी थीं। एफआईआर में चोरी का आरोप भी गलत था। मामले में कई गवाह बयान से पलट गए वहीं, हथियार की बरामदगी भी कानून के हिसाब से साबित नहीं हुई। अदालत ने कहा कि मेडिकल सबूत बेशक चोटों को साबित करते हैं लेकिन वे हमलावर की पहचान के सबूत नहीं। शक चाहे कितना भी मजबूत हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता के स्थापित सिद्धांत पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने माना कि अपील करने वाला शक का लाभ पाने का हकदार था और उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया। जेएनएफ