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Jammu News: नशा तस्करी के आरोपी की जमानत अर्जी खारिज
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कोर्ट ने माना, ऐसा कोई बड़ा बदलाव नहीं कि याचिकाकर्ता को दूसरी जमानत अर्जी दाखिल करनी पड़े
जम्मू। जम्मू के सेशंस/स्पेशल जज, नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस (एनडीपीएस) मामले की अदालत ने नजीर अहमद खान की जमानत अर्जी खारिज कर दी। खान के खिलाफ नशा तस्करी में प्राथमिकी दर्ज हैं। कोर्ट ने माना कि ऐसा कोई बड़ा बदलाव नहीं था कि याचिकाकर्ता को दूसरी जमानत अर्जी दाखिल करनी पड़े।
आवेदक ने अपनी पिछली जमानत अर्जी खारिज होने के बाद एक और जमानत याचिका दायर की थी। इसमें उसने अपने खिलाफ कानूनी तौर पर कोई सबूत न होने को आधार बनाया था। कहा था कि अभियोजन का केस एनडीपीएस एक्ट की धारा 67 के तहत बयानों और केस डायरी रिकॉर्ड पर आधारित है। उसने यह भी दलील दी कि उसके होश में होने पर कोई बरामदगी नहीं हुई और उसे लगातार हिरासत में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।
आरोपी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता का तर्क था कि अभियोजन ने जिस सामग्री पर भरोसा किया उससे आपराधिक साजिश साबित नहीं होती। एनसीबी की ओर से पेश हुए विशेष लोक अभियोजक अजय सिंह मन्हास ने जमानत अर्जी का विरोध किया।
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स्पेशल जज परवेज इकबाल ने कहा कि एक के बाद एक जमानत अर्जी तभी सुनी जा सकती हैं जब हालात में काफी बदलाव हो। कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने जो एकमात्र बदलाव बताया, वह एनसीबी की ओर से बीती 30 अप्रैल को एक पूरक शिकायत दायर करना था।
कोर्ट ने कहा कि केवल चार्जशीट या पूरक शिकायत दायर करने से जमानत देने के लिए हालात में बदलाव नहीं होता। चार्जशीट फाइल करने से पता चलता है कि जांच एजेंसी ने आरोपी पर ट्रायल चलाने के लिए सामग्री एकत्र की है। इससे अभियोजन का केस कमजोर नहीं होता। यह मानते हुए कि नए बड़े बदलाव के बिना अगली जमानत अर्जी में पहले के बेल रिजेक्शन ऑर्डर का रिव्यू करने की इजाजत नहीं, कोर्ट ने जमानत अर्जी खारिज कर दी। जेएनएफ
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जम्मू। जम्मू के सेशंस/स्पेशल जज, नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस (एनडीपीएस) मामले की अदालत ने नजीर अहमद खान की जमानत अर्जी खारिज कर दी। खान के खिलाफ नशा तस्करी में प्राथमिकी दर्ज हैं। कोर्ट ने माना कि ऐसा कोई बड़ा बदलाव नहीं था कि याचिकाकर्ता को दूसरी जमानत अर्जी दाखिल करनी पड़े।
आवेदक ने अपनी पिछली जमानत अर्जी खारिज होने के बाद एक और जमानत याचिका दायर की थी। इसमें उसने अपने खिलाफ कानूनी तौर पर कोई सबूत न होने को आधार बनाया था। कहा था कि अभियोजन का केस एनडीपीएस एक्ट की धारा 67 के तहत बयानों और केस डायरी रिकॉर्ड पर आधारित है। उसने यह भी दलील दी कि उसके होश में होने पर कोई बरामदगी नहीं हुई और उसे लगातार हिरासत में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।
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आरोपी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता का तर्क था कि अभियोजन ने जिस सामग्री पर भरोसा किया उससे आपराधिक साजिश साबित नहीं होती। एनसीबी की ओर से पेश हुए विशेष लोक अभियोजक अजय सिंह मन्हास ने जमानत अर्जी का विरोध किया।
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स्पेशल जज परवेज इकबाल ने कहा कि एक के बाद एक जमानत अर्जी तभी सुनी जा सकती हैं जब हालात में काफी बदलाव हो। कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने जो एकमात्र बदलाव बताया, वह एनसीबी की ओर से बीती 30 अप्रैल को एक पूरक शिकायत दायर करना था।
कोर्ट ने कहा कि केवल चार्जशीट या पूरक शिकायत दायर करने से जमानत देने के लिए हालात में बदलाव नहीं होता। चार्जशीट फाइल करने से पता चलता है कि जांच एजेंसी ने आरोपी पर ट्रायल चलाने के लिए सामग्री एकत्र की है। इससे अभियोजन का केस कमजोर नहीं होता। यह मानते हुए कि नए बड़े बदलाव के बिना अगली जमानत अर्जी में पहले के बेल रिजेक्शन ऑर्डर का रिव्यू करने की इजाजत नहीं, कोर्ट ने जमानत अर्जी खारिज कर दी। जेएनएफ