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Jammu News: जेकेसीए के पूर्व संयुक्त सचिव के खिलाफ मानदेय की वसूली का आदेश रद्द
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-16 नवंबर 2022 को जारी किया था आदेश, हाईकोर्ट ने माना - प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लेख
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन (जेकेसीए) के पूर्व संयुक्त सचिव के खिलाफ एसोसिएशन से मिले मानदेय की रकम वसूली के आदेश को जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने रद्द कर दिया है। यह विवादित आदेश 16 नवंबर, 2022 को जारी किया गया था। कोर्ट ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया। कहा कि इसे बरकरार नहीं रखा जा सकता।
याचिका सुदर्शन मेहता ने दायर की थी। मामले में मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक व गृह विभाग के प्रधान सचिव प्रतिवादी थे। हाईकोर्ट के जस्टिस संजय परिहार और संजीव कुमार की बेंच ने मामले में बीते तीन सितंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था।
याचिकाकर्ता को 11 नवंबर, 1990 को जम्मू-कश्मीर पुलिस में सब इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त किया गया था। उन्हें 31 मार्च, 2000 को इंस्पेक्टर के पद पर प्रमोट किया गया। सरकार के 20 जुलाई, 2012 के आदेश संख्या 625 (पी) के तहत याचिकाकर्ता को प्रभारी डीएसपी के तौर पर तैनात किया गया था।
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साल 2015 में जम्मू-कश्मीर पुलिस मुख्यालय को जानकारी मिली कि याचिकाकर्ता पुलिस विभाग में काम करने के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन (जेकेसीए) में संयुक्त सचिव के बतौर भी काम कर रहा था। उसने इसके लिए जम्मू-कश्मीर सरकारी कर्मचारी (आचरण) नियम, 1971 के तहत सरकार से पहले कोई इजाजत नहीं ली थी। उसे हर माह 12 हजार रुपये का मानदेय मिल रहा था। पुलिस मुख्यालय ने इस बारे में उससे सफाई मांगी। याचिकाकर्ता के खिलाफ देश रतन दुबे की ओर से एक शिकायत में एससी एचजी, सांबा के तौर पर काम करते हुए याचिकाकर्ता के अपनी सरकारी ड्यूटी नहीं निभाने की भी शिकायत मिली थी। जम्मू-कश्मीर पुलिस के महानिदेशक की ओर से यह शिकायत जम्मू-कश्मीर स्टेट विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन (अब एंटी-करप्शन ब्यूरो) को भेज दी गई थी।
इस बीच मुख्यालय को जानकारी मिली कि याचिकाकर्ता के अलावा, एसपी बेनाम तोश, इंस्पेक्टर शरत चंद्र सिंह, इंस्पेक्टर कुलदीप हांडू, इंस्पेक्टर सज्जाद हुसैन और हेड कॉन्स्टेबल राकेश खजूरिया भी सक्षम अधिकारी से इजाजत लिए बिना राज्य की अलग-अलग स्पोर्ट्स एसोसिएशन में अलग-अलग पदों पर काम कर रहे थे। ऐसे में पुलिस मुख्यालय से कारण बताओ नोटिस मिलने के बाद याचिकाकर्ता ने 24 फरवरी, 2016 को जेकेसीए में संयुक्त सचिव का पद संभालने के लिए बाद में मंजूरी को आवेदन किया। हालांकि सक्षम अधिकारी ने ऐसी कोई अनुमति नहीं दी।
गृह विभाग ने 14 नवंबर, 2018 को एक पत्र के माध्यम से पुलिस महानिदेशक से एक रिपोर्ट मांगी। गृह विभाग के पत्र का जवाब देते हुए तत्कालीन पुलिस महानिदेशक ने चार सितंबर, 2021 के अपने पत्र के जरिये गृह विभाग से अपनी पिछली सिफारिशों को रद्द करने की सिफारिश की। याचिकाकर्ता के खिलाफ जांच करने का प्रस्ताव रखा और छह जुलाई, 2022 को याचिकाकर्ता पर लगाए गए आरोपों की गहन जांच करने के लिए एक जांच अधिकारी नियुक्त किया।
जांच अधिकारी ने 14 सितंबर 2022 को अपनी रिपोर्ट में कहा कि याचिकाकर्ता आचरण नियमों के प्रावधानों का उल्लंघन करने के आरोपी थे। 16 नवंबर, 2022 को इस संबंध में आदेश किया गया। कोर्ट ने माना कि ऐसा कोई आरोप नहीं जिसमें याचिकाकर्ता की लापरवाही या धोखाधड़ी से सरकार को हुए किसी नुकसान का जिक्र हो।
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जांच अधिकारी खुद रहे खेल एसोसिएशन के अध्यक्ष
दिलचस्प बात यह थी कि आईजी एचके लोहिया जो याचिकाकर्ता के मामले में जांच अधिकारी थे, खुद जम्मू-कश्मीर वुशू एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके थे। अन्य 51 ऐसे अधिकारियों की भी सूची सामने आई, जो अपने पद पर रहते हुए विभिन्न एसोसिएशनों में पदाधिकारी रहे।
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अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन (जेकेसीए) के पूर्व संयुक्त सचिव के खिलाफ एसोसिएशन से मिले मानदेय की रकम वसूली के आदेश को जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने रद्द कर दिया है। यह विवादित आदेश 16 नवंबर, 2022 को जारी किया गया था। कोर्ट ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया। कहा कि इसे बरकरार नहीं रखा जा सकता।
याचिका सुदर्शन मेहता ने दायर की थी। मामले में मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक व गृह विभाग के प्रधान सचिव प्रतिवादी थे। हाईकोर्ट के जस्टिस संजय परिहार और संजीव कुमार की बेंच ने मामले में बीते तीन सितंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था।
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याचिकाकर्ता को 11 नवंबर, 1990 को जम्मू-कश्मीर पुलिस में सब इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त किया गया था। उन्हें 31 मार्च, 2000 को इंस्पेक्टर के पद पर प्रमोट किया गया। सरकार के 20 जुलाई, 2012 के आदेश संख्या 625 (पी) के तहत याचिकाकर्ता को प्रभारी डीएसपी के तौर पर तैनात किया गया था।
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साल 2015 में जम्मू-कश्मीर पुलिस मुख्यालय को जानकारी मिली कि याचिकाकर्ता पुलिस विभाग में काम करने के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन (जेकेसीए) में संयुक्त सचिव के बतौर भी काम कर रहा था। उसने इसके लिए जम्मू-कश्मीर सरकारी कर्मचारी (आचरण) नियम, 1971 के तहत सरकार से पहले कोई इजाजत नहीं ली थी। उसे हर माह 12 हजार रुपये का मानदेय मिल रहा था। पुलिस मुख्यालय ने इस बारे में उससे सफाई मांगी। याचिकाकर्ता के खिलाफ देश रतन दुबे की ओर से एक शिकायत में एससी एचजी, सांबा के तौर पर काम करते हुए याचिकाकर्ता के अपनी सरकारी ड्यूटी नहीं निभाने की भी शिकायत मिली थी। जम्मू-कश्मीर पुलिस के महानिदेशक की ओर से यह शिकायत जम्मू-कश्मीर स्टेट विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन (अब एंटी-करप्शन ब्यूरो) को भेज दी गई थी।
इस बीच मुख्यालय को जानकारी मिली कि याचिकाकर्ता के अलावा, एसपी बेनाम तोश, इंस्पेक्टर शरत चंद्र सिंह, इंस्पेक्टर कुलदीप हांडू, इंस्पेक्टर सज्जाद हुसैन और हेड कॉन्स्टेबल राकेश खजूरिया भी सक्षम अधिकारी से इजाजत लिए बिना राज्य की अलग-अलग स्पोर्ट्स एसोसिएशन में अलग-अलग पदों पर काम कर रहे थे। ऐसे में पुलिस मुख्यालय से कारण बताओ नोटिस मिलने के बाद याचिकाकर्ता ने 24 फरवरी, 2016 को जेकेसीए में संयुक्त सचिव का पद संभालने के लिए बाद में मंजूरी को आवेदन किया। हालांकि सक्षम अधिकारी ने ऐसी कोई अनुमति नहीं दी।
गृह विभाग ने 14 नवंबर, 2018 को एक पत्र के माध्यम से पुलिस महानिदेशक से एक रिपोर्ट मांगी। गृह विभाग के पत्र का जवाब देते हुए तत्कालीन पुलिस महानिदेशक ने चार सितंबर, 2021 के अपने पत्र के जरिये गृह विभाग से अपनी पिछली सिफारिशों को रद्द करने की सिफारिश की। याचिकाकर्ता के खिलाफ जांच करने का प्रस्ताव रखा और छह जुलाई, 2022 को याचिकाकर्ता पर लगाए गए आरोपों की गहन जांच करने के लिए एक जांच अधिकारी नियुक्त किया।
जांच अधिकारी ने 14 सितंबर 2022 को अपनी रिपोर्ट में कहा कि याचिकाकर्ता आचरण नियमों के प्रावधानों का उल्लंघन करने के आरोपी थे। 16 नवंबर, 2022 को इस संबंध में आदेश किया गया। कोर्ट ने माना कि ऐसा कोई आरोप नहीं जिसमें याचिकाकर्ता की लापरवाही या धोखाधड़ी से सरकार को हुए किसी नुकसान का जिक्र हो।
जांच अधिकारी खुद रहे खेल एसोसिएशन के अध्यक्ष
दिलचस्प बात यह थी कि आईजी एचके लोहिया जो याचिकाकर्ता के मामले में जांच अधिकारी थे, खुद जम्मू-कश्मीर वुशू एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके थे। अन्य 51 ऐसे अधिकारियों की भी सूची सामने आई, जो अपने पद पर रहते हुए विभिन्न एसोसिएशनों में पदाधिकारी रहे।