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Jammu News: जमानत के नाम पर पीएसए के तहत हिरासत से नहीं बचा जा सकता

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हाईकोर्ट ने खारिज की किश्तवाड़ निवासी आरोपी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका
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जम्मू। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने साफ किया है कि किसी आपराधिक मामले में जमानत देने से आरोपी को जन सुरक्षा अधिनियम के तहत निवारक हिरासत से नहीं बचाया जा सकता। अगर संबंधित अथॉरिटी को ऐसा लगता है कि आरोपी की गतिविधियां कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए नुकसानदायक हैं तो उस पर पीएसए के तहत कार्रवाई की जा सकती है।


जस्टिस एमए चौधरी ने यह बात कहते हुए गुरियां, किश्तवाड़ के मोहम्मद रिजवान की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज कर दिया। रिजवान ने अपने पिता अल्ताफ हुसैन के जरिये किश्तवाड़ के जिला मजिस्ट्रेट की ओर से बीते साल 21 जुलाई को उनके खिलाफ पास किए गए हिरासत आदेश को चुनौती दी थी।
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याचिकाकर्ता को जम्मू-कश्मीर जन सुरक्षा अधिनियम-1978 की धारा 8(2) के तहत हिरासत में लिया गया था, ताकि उसे सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाले तरीके से काम करने से रोका जा सके। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि सरकार ने हिरासत आदेश को तय समय के अंदर न तो मंज़ूरी दी थी और न ही कन्फर्म किया था। हिरासत में लिए गए व्यक्ति को संबंधित अधिकारी की ओर से पूरी सामग्री नहीं दी गई। उसे दस्तावेज ऐसी भाषा में दिए गए , जिसे वह समझ नहीं सकता था। उसे हिरासत आदेश के खिलाफ अपना पक्ष रखने के उसके अधिकार के बारे में भी नहीं बताया गया था।
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याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि उसे मामले में पहले ही जमानत मिल चुकी थी। लिहाजा, बाद में उसे निवारक हिरासत में नहीं रखा जा सकता था।

सरकारी वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कि हिरासत आदेश पुलिस डोजियर और जिला मजिस्ट्रेट के सामने रखे गए दूसरे मटीरियल पर विचार करने के बाद पास किया गया था। रिकॉर्ड देखने पर हाई कोर्ट ने पाया कि बीते साल 21 जुलाई का आदेश गृह विभाग ने तीन ही दिन बाद 24 जुलाई को मंजूर कर लिया था। इसे बीते साल 18 अगस्त को कन्फर्म किया गया। ऐसे में मंजूरी और कन्फर्मेशन में देरी के बारे में याचिकाकर्ता की दलील गलत थी।


हिरासत रिकॉर्ड का जिक्र करते हुए कोर्ट ने देखा कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति के खिलाफ चोरी, सेंधमारी और दूसरी गैर सामाजिक गतिविधियों के सिलसिले में चार एफआईआर दर्ज की गई थीं। इससे स्थानीय निवासियों और व्यापारी समुदाय में डर था। हिरासत में कोई प्रक्रियागत खामी न पाते हुए हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
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