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बचाव पक्ष की रणनीति न खुल जाए, इसलिए गवाहों की जिरह टालनी जरूरी: हाईकोर्ट
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जम्मू। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि अगर गवाह एक जैसे तथ्य पेश करने वाले हों तो पहले गवाह की जिरह के बाद बाकी गवाह अपनी गवाही बदल सकते हैं। ऐसे में बचाव पक्ष की रणनीति उजागर हो जाती है, जिससे उन्हें नुकसान हो सकता है। इसलिए अगर जिरह टालने की अर्जी समय पर दी गई हो तो उसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
मामला जम्मू निवासी अवतार सिंह की हत्या से जुड़ा है। इस मामले में रविंदर कुमार और अन्य आरोपी हैं। उन पर हत्या समेत आईपीसी की कई धाराओं के तहत मुकदमा चल रहा है। केस में छह चश्मदीद गवाह हैं जो मृतक के नजदीकी रिश्तेदार हैं और सभी एक ही की घटना की गवाही देने वाले थे।
बचाव पक्ष ने गवाह नंबर- एक की गवाही पूरी होने के बाद अगली तारीख पर एक अर्जी लगाई थी, जिसमें सभी छह गवाहों की जिरह को तब तक टालने की मांग की गई थी, जब तक उनकी गवाही पूरी न हो जाए। उनका तर्क था कि अगर पहले गवाह से जिरह कर ली जाती है तो बाकी गवाह अपनी गवाही उसी के हिसाब से ढाल सकते हैं। इससे उनकी रणनीति उजागर हो जाएगी और मुकदमे में उनका पक्ष कमजोर पड़ सकता है।
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जितनी जल्दी हो सके दायर करें अर्जी
ट्रायल कोर्ट ने इस अर्जी को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह समय पर नहीं दी गई और बचाव पक्ष की चिंता महज आशंका है, लेकिन हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की यह दलील खारिज कर दी। न्यायमूर्ति राजेश सेखरी ने कहा कि भले ही अर्जी गवाही के कैलेंडर बनने से पहले न दी गई हो, लेकिन असली बात यह है कि यह क्रॉस-एग्जामिनेशन शुरू होने से पहले दी गई थी जो कानूनन सही समय है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट एक फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि जिरह टालने की अर्जी जितना जल्दी हो सके दी जानी चाहिए, लेकिन यह कोई सख्त नियम नहीं है। ‘जितना जल्दी हो सके’ और ‘सुझावित तौर पर’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल यह दिखाता है कि यह सिर्फ मार्गदर्शन है, बाध्यकारी नहीं।
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मामला जम्मू निवासी अवतार सिंह की हत्या से जुड़ा है। इस मामले में रविंदर कुमार और अन्य आरोपी हैं। उन पर हत्या समेत आईपीसी की कई धाराओं के तहत मुकदमा चल रहा है। केस में छह चश्मदीद गवाह हैं जो मृतक के नजदीकी रिश्तेदार हैं और सभी एक ही की घटना की गवाही देने वाले थे।
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बचाव पक्ष ने गवाह नंबर- एक की गवाही पूरी होने के बाद अगली तारीख पर एक अर्जी लगाई थी, जिसमें सभी छह गवाहों की जिरह को तब तक टालने की मांग की गई थी, जब तक उनकी गवाही पूरी न हो जाए। उनका तर्क था कि अगर पहले गवाह से जिरह कर ली जाती है तो बाकी गवाह अपनी गवाही उसी के हिसाब से ढाल सकते हैं। इससे उनकी रणनीति उजागर हो जाएगी और मुकदमे में उनका पक्ष कमजोर पड़ सकता है।
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जितनी जल्दी हो सके दायर करें अर्जी
ट्रायल कोर्ट ने इस अर्जी को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह समय पर नहीं दी गई और बचाव पक्ष की चिंता महज आशंका है, लेकिन हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की यह दलील खारिज कर दी। न्यायमूर्ति राजेश सेखरी ने कहा कि भले ही अर्जी गवाही के कैलेंडर बनने से पहले न दी गई हो, लेकिन असली बात यह है कि यह क्रॉस-एग्जामिनेशन शुरू होने से पहले दी गई थी जो कानूनन सही समय है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट एक फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि जिरह टालने की अर्जी जितना जल्दी हो सके दी जानी चाहिए, लेकिन यह कोई सख्त नियम नहीं है। ‘जितना जल्दी हो सके’ और ‘सुझावित तौर पर’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल यह दिखाता है कि यह सिर्फ मार्गदर्शन है, बाध्यकारी नहीं।