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J&K: अशोक चक्र विजेता बलिदानी नजीर अहमद वानी के जीवन पर बनेगी फिल्म, आतंक का रास्ता छोड़ पहनी थी सेना की वर्दी
Mon, 08 Apr 2024 03:11 PM IST
kumar गुलशन कुमार
एएनआई, जम्मू कश्मीर
एएनआई, जम्मू कश्मीर
Published by: kumar गुलशन कुमार
Updated Mon, 08 Apr 2024 03:11 PM IST
सार
कुलगाम जिले के अश्मूजी गांव के नजीर अहमद वानी एक समय खुद आतंकवादी थे। बाद में उन्हें गलती का अहसास हुआ और वह आतंकवाद छोड़कर 2004 में सेना में भर्ती हो गए।
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नजीर अहमद वानी
- फोटो : Twitter
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विस्तार
अशोक चक्र विजेता बलिदानी लांस नायक नजीर अहमद वानी के जीवन से प्रेरित एक बायोपिक की घोषणा की गई है। त्रिशूल मीडिया सॉल्यूशंस द्वारा जारी एक बयान के अनुसार, निर्माता, लेखक और अभिनेता हरमन बावेजा के नेतृत्व में बावेजा स्टूडियोज 'इखवान' नामक फिल्म बना रहा है। इसमें क नजीर अहमद वानी के जीवन पर आधारित बताया जा रहा है।
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यह फिल्म बलिदानी नजीर के एक आतंकवादी से एक सम्मानित भारतीय सैनिक बनने तक की यात्रा को दर्शाएगी। 'इखवान' के बारे में बोलते हुए, निर्माता बवेजा ने कहा, 'हम बलिदानी लांस नायक नजीर वानी की प्रेरणादायक यात्रा को सिल्वर स्क्रीन पर लाने के लिए सम्मानित और उत्साहित हैं। उग्रवाद से लेकर अंततः असाधारण वीरता के साथ देश की सेवा करने तक की उनकी यात्रा दुनिया के लिए एक कहानी होगी।'
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यह फिल्म हमारे देश की रक्षा के लिए किए गए बलिदानों के लिए उनके, उनकी पत्नी और भारतीय सेना के लिए एक श्रद्धांजलि है।'' दिवंगत लांस नायक नजीर वानी की पत्नी महजबीन अख्तर ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा, 'एक परिवार के रूप में मुझे अपने दिवंगत पति, अशोक चक्र विजेता, के बलिदान पर बहुत गर्व है। हम 'इखवान' के माध्यम से उनके बलिदान पर प्रकाश डालने के लिए हरमन बावेजा और बावेजा स्टूडियोज के आभारी हैं। हम बेसब्री से इसके रिलीज होने का इंतजार कर रहे हैं।'
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जनवरी 2019 में, लांस नायक वानी को मरणोपरांत 'अशोक चक्र' से सम्मानित किया गया। 2018 में कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियान में उनकी भूमिका के लिए भारत का सर्वोच्च शांति समय वीरता पुरस्कार उन्हें दिया गया।
38 वर्षीय सैनिक ने शोपियां जिले के हीरापुर गांव में एक आतंकवाद विरोधी अभियान में लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) के जिला कमांडर और एक विदेशी आतंकवादी को ढेर कर दिया, जिसके बाद कई बार गोली लगने के बाद गंभीर घावों के कारण वह वीरगति को प्राप्त हुए।
वानी पर बन रही फिल्म पर इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के पूर्व प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल सतीश दुआ ने कहा, 'इखवान' कश्मीरी देशभक्ति की कहानी है जो नजीर अहमद वानी के प्रेरणादायक जीवन के माध्यम से बताई गई है, जो एक आतंकवादी से इखवानी और फिर मेरी जेएकेएलआई का सैनिक था, जिसने देश के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। उन्हें शांतिकाल में सर्वोच्च वीरता पदक, अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। उनकी कहानी को एक ऐसी फिल्म में प्रदर्शित करने के लिए बवेजा स्टूडियो को बधाई, जो निश्चित रूप से सभी भारतीयों को प्रेरित करेगी।'
जानें कौन हैं बलिदानी नजीर अहमद वानी
दक्षिणी कश्मीर के कुलगाम जिले के अश्मूजी गांव के नजीर एक समय खुद आतंकवादी थे। बाद में उन्हें गलती का अहसास हुआ और वह आतंकवाद छोड़कर 2004 में सेना में भर्ती हो गए। नजीर की तरह के लोगों को घाटी में इख्वान कहते हैं। आतंकियों के सफाया के लिए चलाए गए कई आपरेशन में शामिल हुए।
23 नवंबर 2018 को जब वानी 34 राष्ट्रीय रायफ ल्स के साथियों के साथ ड्यूटी पर थे, तब इंटेलिजेंस से शोपियां के बटागुंड गांव में हिजबुल और लश्कर के छह आतंकियों के मौजूद होने की खबर मिली।
इनपुट थे कि आतंकियों के पास भारी मात्रा में हथियार और गोले बारूद हैं। इस एनकाउंटर में वानी और उनके साथियों ने कुल छह आतंकियों को मार गिराया था। वानी ने दो आतंकियों को मारने और अपने घायल साथी को बचाते हुए सबसे बड़ा बलिदान दिया।
एनकाउंटर में वह बुरी तरह जख्मी हो गए थे और हॉस्पिटल में इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया था। 26 नवंबर को अंतिम संस्कार से पहले वानी को उनके गांव में 21 तोपों की सलामी दी गई थी। वह अपने पीछे पत्नी और दो बच्चे छोड़ गए।
दक्षिणी कश्मीर के कुलगाम जिले के अश्मूजी गांव के नजीर एक समय खुद आतंकवादी थे। बाद में उन्हें गलती का अहसास हुआ और वह आतंकवाद छोड़कर 2004 में सेना में भर्ती हो गए। नजीर की तरह के लोगों को घाटी में इख्वान कहते हैं। आतंकियों के सफाया के लिए चलाए गए कई आपरेशन में शामिल हुए।
23 नवंबर 2018 को जब वानी 34 राष्ट्रीय रायफ ल्स के साथियों के साथ ड्यूटी पर थे, तब इंटेलिजेंस से शोपियां के बटागुंड गांव में हिजबुल और लश्कर के छह आतंकियों के मौजूद होने की खबर मिली।
इनपुट थे कि आतंकियों के पास भारी मात्रा में हथियार और गोले बारूद हैं। इस एनकाउंटर में वानी और उनके साथियों ने कुल छह आतंकियों को मार गिराया था। वानी ने दो आतंकियों को मारने और अपने घायल साथी को बचाते हुए सबसे बड़ा बलिदान दिया।
एनकाउंटर में वह बुरी तरह जख्मी हो गए थे और हॉस्पिटल में इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया था। 26 नवंबर को अंतिम संस्कार से पहले वानी को उनके गांव में 21 तोपों की सलामी दी गई थी। वह अपने पीछे पत्नी और दो बच्चे छोड़ गए।