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कारगिल के शहीद दिवेंद्र सिंह की स्टोरी
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Became widow before the fall of henna
- फोटो : RSPURA
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आरएस पुरा। 20 वर्ष पहले कारगिल युद्ध में शहीद हुए कोटली शाह दौला के वीर सपूत देविंदर सिंह की याद उनकी पत्नी को झकझोर देता है। आठ सिख रजिमेंट में के सिपाही रहे देविंदर की शादी हुए अभी मात्र चार महीने ही बीते थे। पत्नी के हाथों से मानो मेंहदी का रंग भी नहीं उतरा था कि उनका सुहाग उजड़ गया था।
शादी के बाद वह अभी छुट्टी काटकर रजिमेंट लौटे ही थे कि कारगिल युद्ध के लिए कश्मीर जाने का निर्देश मिला और वह वहां पहुंच गए। देविंदर सिंह के लिए यह मुश्किल घड़ी थी क्योंकि उन्होंने खूबसूरत नई जिंदगी की शुरुआत की ही थी कि तुरंत सामने युद्ध का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने वतन के लिए सब कुछ भूल कर दुश्मन से लोहा लिया। आखिर छह जून 1999 वे शहीद हो गए।
शहीद की पत्नी बलजीत कौर ने कहा कि उस घड़ी की पीड़ा को शब्दों में बयां करना मुमकिन नहीं है। हाथों से मेंहदी का रंग नहीं उतरा था और पति का साथ छूट गया। शहादत पाने के तीन दिन बाद उनका शव तिरंगे में लिपटे ताबूत में गांव पहुंचा था। देविंदर के इस तरह चले जाने से वह टूट चुकी थी। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि जीवन भर साथ बिताने के वादे का क्या होगा? एक वर्ष बात देविंदर के छोटे भाई के साथ मेरी दूसरी शादी कर दी गई।
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दूसरी शादी से दो बेटे हैं। आज बीस वर्ष बीत जाने के बाद भी देविंदर के साथ बिताये पलों की यादें आज भी जिंदा हैं। उसे जीवन भर भूला नहीं जा सकता है। बलजीत कौर ने बताया कि उसके बडे़ बेटे का नाम युद्धवीर सिंह रखा है। वह 12वीं कक्षा में पढ़ता है। ताया की तस्वीर देखकर उसमें भी देश सेवा की भावना हिलकोरें मारता है। वह सेना में भर्ती होने की बात करता है।
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शादी के बाद वह अभी छुट्टी काटकर रजिमेंट लौटे ही थे कि कारगिल युद्ध के लिए कश्मीर जाने का निर्देश मिला और वह वहां पहुंच गए। देविंदर सिंह के लिए यह मुश्किल घड़ी थी क्योंकि उन्होंने खूबसूरत नई जिंदगी की शुरुआत की ही थी कि तुरंत सामने युद्ध का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने वतन के लिए सब कुछ भूल कर दुश्मन से लोहा लिया। आखिर छह जून 1999 वे शहीद हो गए।
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शहीद की पत्नी बलजीत कौर ने कहा कि उस घड़ी की पीड़ा को शब्दों में बयां करना मुमकिन नहीं है। हाथों से मेंहदी का रंग नहीं उतरा था और पति का साथ छूट गया। शहादत पाने के तीन दिन बाद उनका शव तिरंगे में लिपटे ताबूत में गांव पहुंचा था। देविंदर के इस तरह चले जाने से वह टूट चुकी थी। कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि जीवन भर साथ बिताने के वादे का क्या होगा? एक वर्ष बात देविंदर के छोटे भाई के साथ मेरी दूसरी शादी कर दी गई।
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दूसरी शादी से दो बेटे हैं। आज बीस वर्ष बीत जाने के बाद भी देविंदर के साथ बिताये पलों की यादें आज भी जिंदा हैं। उसे जीवन भर भूला नहीं जा सकता है। बलजीत कौर ने बताया कि उसके बडे़ बेटे का नाम युद्धवीर सिंह रखा है। वह 12वीं कक्षा में पढ़ता है। ताया की तस्वीर देखकर उसमें भी देश सेवा की भावना हिलकोरें मारता है। वह सेना में भर्ती होने की बात करता है।