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Jammu News: बाबा बूढ़ा अमरनाथ...महाऋषि पुलस्त्य के तप से प्रसन्न हो यहां शिवलिंग रूप में विराजमान हुए थे भगवान शिव
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-बाबा बूढ़ा अमरनाथ में श्रावण के अंतिम सोमवार को उमड़ा श्रद्धा का सैलाब
पुंछ। बाबा बूढ़ा अमरनाथ में श्रावण के अंतिम सोमवार को श्रद्धा का सैलाब उमड़ा। शाम को छड़ी मुबारक यात्रा के पहुंचने पर भव्य स्वागत किया गया। भगवान भोलेनाथ के इस परम धाम में अब तीन दिन तक रक्षा बंधन उत्सव मनाया जाएगा। वहीं, बताया जाता है कि इस धाम का लंका नरेश रावण के दादा महाऋषि पुलस्त्य से भी संबंध रहा है।
किदवंति के अनुसार महाऋषि पुलस्त्य योग साधना के लिए वनों का भ्रमण करते हुए इस स्थल पर पहुंचे तो उन्हें यहां अद्भुत अनुभूति हुई। उन्होंने यहां आसन लगाकर भगवान भोलेनाथ की अराधना की। वर्षों तप करने पर भगवान भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर महाऋषि को दर्शन दिए। वरदान मांगने को कहा, जिस पर महाऋषि ने भगवान से इसी स्थान पर विराजमान होने का आग्रह किया। कहते हैं कि इसके बाद भोलेनाथ अदृष्य हो गए। यहां सफेद पत्थर शिवलिंग रूप में प्रकट हो गया। इसके बाद वर्षों तक महाऋषि ने यहां पूजा-अर्चना की। महाऋषि के वर्षों तप करने के चलते क्षेत्र का नाम पुलस्त्य नगरी और मंदिर के पास बहने वाली नदी का नाम पुलस्त्य गंगा पड़ गया, जोकि अपभ्रंष होते-होते आज पुंछ हो गया है।
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पुंछ। बाबा बूढ़ा अमरनाथ में श्रावण के अंतिम सोमवार को श्रद्धा का सैलाब उमड़ा। शाम को छड़ी मुबारक यात्रा के पहुंचने पर भव्य स्वागत किया गया। भगवान भोलेनाथ के इस परम धाम में अब तीन दिन तक रक्षा बंधन उत्सव मनाया जाएगा। वहीं, बताया जाता है कि इस धाम का लंका नरेश रावण के दादा महाऋषि पुलस्त्य से भी संबंध रहा है।
किदवंति के अनुसार महाऋषि पुलस्त्य योग साधना के लिए वनों का भ्रमण करते हुए इस स्थल पर पहुंचे तो उन्हें यहां अद्भुत अनुभूति हुई। उन्होंने यहां आसन लगाकर भगवान भोलेनाथ की अराधना की। वर्षों तप करने पर भगवान भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर महाऋषि को दर्शन दिए। वरदान मांगने को कहा, जिस पर महाऋषि ने भगवान से इसी स्थान पर विराजमान होने का आग्रह किया। कहते हैं कि इसके बाद भोलेनाथ अदृष्य हो गए। यहां सफेद पत्थर शिवलिंग रूप में प्रकट हो गया। इसके बाद वर्षों तक महाऋषि ने यहां पूजा-अर्चना की। महाऋषि के वर्षों तप करने के चलते क्षेत्र का नाम पुलस्त्य नगरी और मंदिर के पास बहने वाली नदी का नाम पुलस्त्य गंगा पड़ गया, जोकि अपभ्रंष होते-होते आज पुंछ हो गया है।
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