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कश्मीर में बना गठबंधन लेह चुनाव में भी भाजपा की बढ़ा सकता है दिक्कत
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जम्मू। कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी सहित छह दलों के गठबंधन से लद्दाख में लेह स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद चुनाव में सियासी समीकरण बदल सकते हैं। लेह चुनाव में यह गठबंधन भाजपा की दिक्कत बढ़ा सकता है। भाजपा को दोबारा सत्ता में आने के लिए बहुमत का आंकड़ा हासिल करना पड़ेगा।
2015 में भाजपा ने लेह काउंसिल की 26 में से 18 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की थी। इस बार परिस्थितियां बदल गई हैं। कश्मीर में नेकां, पीडीपी, पीपुल्स कांफ्रेंस समेत छह दलों ने महागठबंधन बनाया है। सूत्रों के अनुसार कांग्रेस भी इस गठबंधन को अंदर खाते समर्थन दे रही है। ऐसे में लेह काउंसिल के चुनाव नतीजों के बाद अगर महागठबंधन में शामिल दल लेह में भी एक साथ आ जाते हैं तो भाजपा के लिए परेशानी बढ़ सकती है। अनुच्छेद 370 को खत्म करने और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिलने के बाद पहली बार होने जा रहे लेह स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद का चुनाव भाजपा केे लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। 20 अक्तूबर को प्रचार थमने तक भाजपा ने पूरा जोर डोर टू डोर अभियान पर लगा दिया है।
तीन केंद्रीय मंत्री कर चुके चुनाव प्रचार
तीन केंद्रीय मंत्रियों अनुराग ठाकुर, मुख्तार अब्बास नकवी और किरण रिजिजू चुनाव प्रचार कर चुके हैं। भाजपा के जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के संगठन महासचिव अशोक कौल पिछले 15 दिनों से लेह में रहकर ही प्रचार अभियान के अलावा पार्टी के चुनाव प्रबंधन में जुटे हुए हैं। सांसद व लद्दाख भाजपा अध्यक्ष जाम्यांग सेरिंग नामग्याल भी चुनाव प्रचार में जुटे हैं।
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पिछली बार कांग्रेस को मिली थीं पांच सीटें
लेह काउंसिल चुनाव में बहुमत हासिल करने के लिए 14 सीटों पर जीत जरूरी है। 2015 के चुनाव में कांग्रेस को पांच, पीडीपी को दो सीटें मिली थीं। एक सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी की जीत हुई थी। भाजपा ने लेह काउंसिल के इतिहास में 18 सीटें जीतकर पहली बार काउंसिल का गठन किया था।
जम्मू-कश्मीर में भी महागठबंधन के दूरगामी परिणाम
जम्मू-कश्मीर में भी महागठबंधन के दूूरगामी परिणाम सामने आएंगे। जब भी यहां पर विधानसभा चुनाव होंगे तो सत्ता हासिल करने के लिए भाजपा को गठबंधन साथी के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। केंद्र शासित लद्दाख में विधानसभा नहीं है, लेकिन जम्मू-कश्मीर में विधानसभा का प्रावधान रखा गया है और यहां पर विधानसभा चुनाव को ज्यादा देर तक टाला नहीं जा सकता है।
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2015 में भाजपा ने लेह काउंसिल की 26 में से 18 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की थी। इस बार परिस्थितियां बदल गई हैं। कश्मीर में नेकां, पीडीपी, पीपुल्स कांफ्रेंस समेत छह दलों ने महागठबंधन बनाया है। सूत्रों के अनुसार कांग्रेस भी इस गठबंधन को अंदर खाते समर्थन दे रही है। ऐसे में लेह काउंसिल के चुनाव नतीजों के बाद अगर महागठबंधन में शामिल दल लेह में भी एक साथ आ जाते हैं तो भाजपा के लिए परेशानी बढ़ सकती है। अनुच्छेद 370 को खत्म करने और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिलने के बाद पहली बार होने जा रहे लेह स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद का चुनाव भाजपा केे लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। 20 अक्तूबर को प्रचार थमने तक भाजपा ने पूरा जोर डोर टू डोर अभियान पर लगा दिया है।
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तीन केंद्रीय मंत्री कर चुके चुनाव प्रचार
तीन केंद्रीय मंत्रियों अनुराग ठाकुर, मुख्तार अब्बास नकवी और किरण रिजिजू चुनाव प्रचार कर चुके हैं। भाजपा के जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के संगठन महासचिव अशोक कौल पिछले 15 दिनों से लेह में रहकर ही प्रचार अभियान के अलावा पार्टी के चुनाव प्रबंधन में जुटे हुए हैं। सांसद व लद्दाख भाजपा अध्यक्ष जाम्यांग सेरिंग नामग्याल भी चुनाव प्रचार में जुटे हैं।
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पिछली बार कांग्रेस को मिली थीं पांच सीटें
लेह काउंसिल चुनाव में बहुमत हासिल करने के लिए 14 सीटों पर जीत जरूरी है। 2015 के चुनाव में कांग्रेस को पांच, पीडीपी को दो सीटें मिली थीं। एक सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी की जीत हुई थी। भाजपा ने लेह काउंसिल के इतिहास में 18 सीटें जीतकर पहली बार काउंसिल का गठन किया था।
जम्मू-कश्मीर में भी महागठबंधन के दूरगामी परिणाम
जम्मू-कश्मीर में भी महागठबंधन के दूूरगामी परिणाम सामने आएंगे। जब भी यहां पर विधानसभा चुनाव होंगे तो सत्ता हासिल करने के लिए भाजपा को गठबंधन साथी के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। केंद्र शासित लद्दाख में विधानसभा नहीं है, लेकिन जम्मू-कश्मीर में विधानसभा का प्रावधान रखा गया है और यहां पर विधानसभा चुनाव को ज्यादा देर तक टाला नहीं जा सकता है।