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सद्दल त्रासदी का एक साल, आज भी खुले में रहने को मजबूर
ब्यूरो/अमर उजाला, जम्मू
Updated Sun, 06 Sep 2015 10:30 AM IST
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सद्दल में प्रकृति की विनाश लीला से पीड़ित लोगों को यह एहसास नहीं हो रहा है कि उन पर दुख का पहाड़ टूटे एक साल बीत गया। उन्हें ऐसा लग रहा है जैसे कुछ दिनों पहले ही प्रकृति ने उजाड़ा है।
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उधमपुर के झक्खड़ सुई में समय काट रहे सद्दल के लोगों ने कुछ इस तरह अपने दर्द का बयान किया। उन लोगों ने यह भी कहा कि शुरुआती कुछ महीनों तक तो उन्हें राशन और राहत सामग्री दी गई पर अब तो सरकार जैसे भूल ही गई कि सद्दल में कोई त्रासदी भी हुई थी।
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झक्खड़ सुई कैंप में रहने वालों के मुताबिक वे बदतर जिंदगी जीने को मजबूर हैं। बच्चों की शिक्षा भी प्रभावित हो रही है। स्वास्थ्य सुविधाओं का भी कैंप में टोटा है।
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सुविधा के नाम पर कुछ भी नहीं है। लोगों का इलाज भी सही नहीं हो रहा है। कैंप में रहने वाले कालू राम ने बताया कि उसके पिता, भाई और दो बेटियों को प्रकृतिक ने उससे सदा के लिए जुदा कर दिया।
माधोराम को अब भी सद्दल में अपनों के खोने का सदमा है। रुमालो राम, सुरजीत कुमार, रमेश कुमार के अनुसार किसी तरह वह जिंदा तो बच गए, पर अब सुई में तिल-तिल कर जी रहे हैं।
उन्हें कई तरह की असुविधाएं हो रही हैं। एक शेड है और उसमें प्लाई बोर्ड से बनाया गए छोटे कमरे। पीने की पानी और शौच की भी सुविधा पर्याप्त नहीं है।