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Jammu News: ठेठ बिहारी अंदाज और डोगरा संस्कृति का अनूठा संगम

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A unique blend of quintessential Bihari style and Dogra culture
विजय पासवान
जम्मू की डोगरी और बिहार की मैथिली के बीच पनपी प्रेम की भाषा, जम्मू-कश्मीर में बासमती काटने पहुंचे हैं 25 हजार श्रमिक
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-भारत की क्षेत्रीय विविधता में दिख रही एकता की जीवंत मिसाल
अखिलेश शर्मा
जम्मू। जम्मू-कश्मीर के डुग्गर क्षेत्र में इन दिनों विश्व प्रसिद्ध बासमती धान की कटाई जोरों पर है। इस सुनहरी फसल को सहेजने के लिए बिहार से करीब 25 हजार प्रवासी श्रमिक आरएस पुरा, सांबा, अखनूर और कठुआ पहुंचे हैं।
यह महज एक मौसमी पलायन नहीं, बल्कि सदियों पुरानी ऐसी परंपरा है जो जम्मू की डोगरा संस्कृति और बिहार की मिथिला संस्कृति को अटूट धागे में बांधती है। खेतों में जब ठेठ मैथिली और डोगरी भाषा का मिलन होता है, तो वह सरहदों से परे एक प्रेम की नई भाषा बन जाती है।
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जम्मू की धरती पर बासमती धान सहेजने में इन श्रमिकों का पसीना लगा है। दिनभर खेतों में कड़ी मेहनत के बाद, इनके चेहरों पर थकान नहीं, बल्कि एक अनोखी चमक दिखती है। यह चमक है अपने घर लौटने की और साल के सबसे बड़े महापर्व छठ मैया को मनाने की। यहां से होने वाली कमाई सीधे मिथिलांचल के गांवों में त्योहार की रौनक बनकर पहुंचती है।
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कहते हैं श्रमिक : धान काटि के फेर मिथिला जेबै आउ छठि मइया के परब मनेबै
धान काटि के फेर मिथिला जेबै आउ छठि मइया के परब मनेबै। ई कमाई हमर नै, ई त मइया के परसादी छै। सालभर हम इस दिन का इंतजार करते हैं कि कब जम्मू जाएंगे, कमाएंगे और घर जाकर खुशी-खुशी घाट सजाएंगे। - विजय पासवान अररिया (मिथिलांचल-बिहार)
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हम डोगरी तो पूरी नहीं बोल सकते, लेकिन जमींदार जब डोगरी में पूछते हैं- तुम ठीक हो?, तो हम हंसकर कहते हैं- हां मालिक, सब ठीक है। यह बोली नहीं, दिल का रिश्ता हो गया है। वो हमें अपने परिवार जैसा रखते हैं।
- उमेश पासवान
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हम तो पिछले बीस साल से जम्मू आ रहे हैं। हमारे लिए यह सिर्फ मजदूरी नहीं, बल्कि छठ मैया का आशीर्वाद है। जो कमाई यहां से होती है, उससे घर का सूप-दउरा सजता है और परिवार को नया कपड़ा मिलता है।
- सियाराम पासवान
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यह मेरा दूसरा साल है जम्मू में। शुरू में भाषा समझने में दिक्कत हुई थी, लेकिन अब जमींदार भाइयों से बातचीत हो जाती है। हम आपको सच बताएं, जब खेत में काम करते समय भूख लगती है, तो यहां के मालिक अपने हाथ से रोटी और अचार दे जाते हैं। इस अपनेपन के चलते थकावट गायब हो जाती है।
- नितीश
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हां भाई, बोली भले अलग है लेकिन पेट और प्रीत की भाषा एक होती है। जब हम सब मैथिली में गीत गाते हैं- कांच ही बांस के बहंगिया, तो जम्मू के लोग भी रुक कर सुनते हैं। वो सब कहते हैं- तुम्हारी बोली बहुत मीठी है। बस, यही प्रेम तो हम सबको हर साल यहां खींच लाता है।
- वालो पासवान
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डोगरा किसान बोले : इनके बिना फसल अधूरी
आरएस पुरा के किसान मनदेव सिंह का कहना है कि इन श्रमिकों के साथ उनका रिश्ता पीढ़ियों पुराना हैं- ये लोग हमारे मेहमान जैसे हैं। जब तक बिहार से ये भाई नहीं आते, हमारे खेतों में रौनक नहीं आती। इनकी मेहनत से ही हमारी बासमती मंडियों तक पहुंचती है। हम भी ध्यान रखते हैं कि इन्हें सही समय पर मजदूरी मिले ताकि ये अपने घर जाकर धूमधाम से छठ पूजा मना सकें।

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छठ मइया की आस्था का संबल
धान की कटाई और छठ पूजा का आगमन लगभग एक साथ होता है। अक्टूबर-नवंबर के इस सीजन में होने वाली यह कमाई श्रमिक परिवारों के लिए सबसे बड़ा संबल होती है। नए कपड़े खरीदना, सूप-दउरा सजाना और पूजा की सामग्री जुटाना, सब कुछ इसी बासमती की कटाई पर निर्भर करता है। ठेठ बिहारी अंदाज और डोगरी अपनेपन का यह अनूठा संगम भारत की विविधता में एकता की सबसे जीवंत मिसाल है।

विजय पासवान

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