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राग रहित होने के बाद मानव को मिलती है मुक्ति
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उधमपुर के उमाला में सत्संग में प्रवचन करते संत सुभाष शास्त्री व कथा सुनते श्रद्धालु
- फोटो : UDHAMPUR
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उधमपुर। नववर्ष के पहले रविवार को कथावाचक सुभाष शास्त्री ने अखंड परमधाम आश्रम उमाला में सत्संग का आयोजन किया। इसमें शहर व ग्रामीण इलाकों से भारी संख्या में श्रद्धालुओं पहुंचे।
कथावाचक ने श्रद्धालुओं को बताया कि जीवन के सच्चे साथी केवल प्रभु ही हैं। अगर किसी का आसरा लेना है तो वह केवल प्रभु हैं। मुक्ति प्रभु की शरण में जाने से ही मिलती है। मुक्ति तब मिलती है जब मनुष्य राग रहित हो जाता है। राग आदमी का ईमान खराब कर देता है। राग से ही मानव कर्मों के बंधन में बंध जाता है। यही राग उसको चिंता में डाल देता है। इसलिए जन्म मरण के बंधन से मुक्ति चाहते है तो राग को छोड़ना पड़ेगा।
उन्होंने बताया कि जब आम राग को छोड़ कर संतों के साथ बैठते हो तो आपको महसूस होगा कि आम काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से दूर होते जा रहे हैं। इनके स्थान पर आपके मन में प्रेम, आनंद, भक्ति का वास होने लगता है। राग रहित होने का अर्थ है कि आप प्रभु की शरण में पहुंच चुके हैं। प्रभु की शरण में जाकर ब्रह्मज्ञान का बोध होता है और मानव ब्रह्म होने लगता है। फिर मानव के लिए कुछ हासिल करना शेष नहीं रहता है।
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कथावाचक ने कहा कि इच्छाओं के खत्म होने के बाद ही मानव को सुख का अहसास होने लगता है। इच्छाओं में फंसे रहने के कारण भक्ति का आनंद प्राप्त नहीं होता। अपने अपने विचारों को भी ठीक करना है। जिस प्रकार के विचार रखेंगे, उसी अनुसार कर्मों का फल भी मिलेगा। इसलिए, मन को हमेशा साफ रखें। किसी के प्रति मन में नफरत न रखें।
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कथावाचक ने श्रद्धालुओं को बताया कि जीवन के सच्चे साथी केवल प्रभु ही हैं। अगर किसी का आसरा लेना है तो वह केवल प्रभु हैं। मुक्ति प्रभु की शरण में जाने से ही मिलती है। मुक्ति तब मिलती है जब मनुष्य राग रहित हो जाता है। राग आदमी का ईमान खराब कर देता है। राग से ही मानव कर्मों के बंधन में बंध जाता है। यही राग उसको चिंता में डाल देता है। इसलिए जन्म मरण के बंधन से मुक्ति चाहते है तो राग को छोड़ना पड़ेगा।
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उन्होंने बताया कि जब आम राग को छोड़ कर संतों के साथ बैठते हो तो आपको महसूस होगा कि आम काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से दूर होते जा रहे हैं। इनके स्थान पर आपके मन में प्रेम, आनंद, भक्ति का वास होने लगता है। राग रहित होने का अर्थ है कि आप प्रभु की शरण में पहुंच चुके हैं। प्रभु की शरण में जाकर ब्रह्मज्ञान का बोध होता है और मानव ब्रह्म होने लगता है। फिर मानव के लिए कुछ हासिल करना शेष नहीं रहता है।
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कथावाचक ने कहा कि इच्छाओं के खत्म होने के बाद ही मानव को सुख का अहसास होने लगता है। इच्छाओं में फंसे रहने के कारण भक्ति का आनंद प्राप्त नहीं होता। अपने अपने विचारों को भी ठीक करना है। जिस प्रकार के विचार रखेंगे, उसी अनुसार कर्मों का फल भी मिलेगा। इसलिए, मन को हमेशा साफ रखें। किसी के प्रति मन में नफरत न रखें।

उधमपुर के उमाला में सत्संग में प्रवचन करते संत सुभाष शास्त्री व कथा सुनते श्रद्धालु- फोटो : UDHAMPUR