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Udhampur News: भद्रवाह में तीन दिवसीय प्राचीन कैलाश यात्रा का समापन
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भद्रवाह। जम्मू-कश्मीर के भद्रवाह में तीन दिवसीय प्राचीन कैलाश यात्रा का वीरवार शाम पवित्र छड़ी मुबारक के ऐतिहासिक वासुकी नाग मंदिर, गाठा में लौटने के साथ विधिवत समापन हो गया। इस अवसर पर सैकड़ों श्रद्धालुओं ने पवित्र छड़ी का श्रद्धा और उत्साह के साथ स्वागत किया।
यात्रा के अंतिम दिन हजारों श्रद्धालु समुद्र तल से करीब 14,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित पवित्र कैलाश कुंड पहुंचे और बर्फ जैसे ठंडे पानी में आस्था की डुबकी लगाई। श्रद्धालुओं ने पवित्र झील में स्नान कर भगवान शिव और वासुकी नाग का आशीर्वाद प्राप्त किया।
भगवान वासुकी नाग की पवित्र छड़ी ने गाठा स्थित प्राचीन नाग मंदिर से अपनी यात्रा शुरू की थी। रास्ते में जम्मू-कश्मीर के विभिन्न क्षेत्रों से आई करीब आधा दर्जन अन्य छड़ियां भी मुख्य यात्रा में शामिल हुईं। इनमें भलेसा, बसंतगढ़, बनी, डुडू, बिलावर और मठोला की छड़ियां शामिल थीं।
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लगभग 21 किलोमीटर लंबे पहाड़ी मार्ग पर चलने के दौरान श्रद्धालुओं ने हयान, रामतुंड और ऋषि दल में क्रमशः रात्रि विश्राम किया। दुर्गम और ऊंचाई वाले पहाड़ी रास्ते से गुजरते हुए श्रद्धालु अंततः पवित्र कैलाश कुंड पहुंचे, जहां उन्होंने सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं के अनुसार पूजा-अर्चना और स्नान किया।
कैलाश कुंड ठंडे और निर्मल जल वाली एक विशाल झील है, जिसकी परिधि करीब 1.5 मील बताई जाती है। यह समुद्र तल से लगभग 14,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। हर वर्ष आयोजित होने वाली इस यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु कठिन पहाड़ी मार्ग तय कर पवित्र कुंड तक पहुंचते हैं।
स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, कैलाश कुंड भगवान शिव का मूल निवास स्थान था। मान्यता है कि भगवान शिव ने बाद में यह स्थान वासुकी नाग को सौंप दिया और स्वयं हिमाचल प्रदेश के भरमौर में स्थित मणिमहेश चले गए। इसी मान्यता के कारण कैलाश कुंड और वासुकी नाग से जुड़ी इस यात्रा का स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच विशेष धार्मिक महत्व है।
यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं ने काली नाग, हयान, गण ठाक, गौ-पीड़ा, रामतुंड और शंख पाडर सहित विभिन्न पवित्र स्थलों पर पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान किए। इन अनुष्ठानों के बाद छड़ी मुबारक को कैलाश कुंड ले जाया गया, जहां अंतिम धार्मिक रस्में संपन्न की गईं।
कैलाश कुंड में धार्मिक अनुष्ठान और स्नान संपन्न करने के बाद पवित्र छड़ी वापस भद्रवाह के लिए रवाना हुई। वीरवार शाम छड़ी के वासुक डेरा पहुंचने पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उसके स्वागत के लिए एकत्र हुए। भगवान वासुकी नाग के जयकारों के बीच श्रद्धालुओं ने छड़ी मुबारक का स्वागत किया और पूजा-अर्चना की।
छड़ी मुबारक के गाठा स्थित ऐतिहासिक वासुकी नाग मंदिर में वापस पहुंचने के साथ ही भद्रवाह की सदियों पुरानी तीन दिवसीय कैलाश यात्रा धार्मिक आस्था, परंपरा और उत्साह के बीच संपन्न हो गई।
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यात्रा के अंतिम दिन हजारों श्रद्धालु समुद्र तल से करीब 14,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित पवित्र कैलाश कुंड पहुंचे और बर्फ जैसे ठंडे पानी में आस्था की डुबकी लगाई। श्रद्धालुओं ने पवित्र झील में स्नान कर भगवान शिव और वासुकी नाग का आशीर्वाद प्राप्त किया।
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भगवान वासुकी नाग की पवित्र छड़ी ने गाठा स्थित प्राचीन नाग मंदिर से अपनी यात्रा शुरू की थी। रास्ते में जम्मू-कश्मीर के विभिन्न क्षेत्रों से आई करीब आधा दर्जन अन्य छड़ियां भी मुख्य यात्रा में शामिल हुईं। इनमें भलेसा, बसंतगढ़, बनी, डुडू, बिलावर और मठोला की छड़ियां शामिल थीं।
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लगभग 21 किलोमीटर लंबे पहाड़ी मार्ग पर चलने के दौरान श्रद्धालुओं ने हयान, रामतुंड और ऋषि दल में क्रमशः रात्रि विश्राम किया। दुर्गम और ऊंचाई वाले पहाड़ी रास्ते से गुजरते हुए श्रद्धालु अंततः पवित्र कैलाश कुंड पहुंचे, जहां उन्होंने सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं के अनुसार पूजा-अर्चना और स्नान किया।
कैलाश कुंड ठंडे और निर्मल जल वाली एक विशाल झील है, जिसकी परिधि करीब 1.5 मील बताई जाती है। यह समुद्र तल से लगभग 14,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। हर वर्ष आयोजित होने वाली इस यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु कठिन पहाड़ी मार्ग तय कर पवित्र कुंड तक पहुंचते हैं।
स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, कैलाश कुंड भगवान शिव का मूल निवास स्थान था। मान्यता है कि भगवान शिव ने बाद में यह स्थान वासुकी नाग को सौंप दिया और स्वयं हिमाचल प्रदेश के भरमौर में स्थित मणिमहेश चले गए। इसी मान्यता के कारण कैलाश कुंड और वासुकी नाग से जुड़ी इस यात्रा का स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच विशेष धार्मिक महत्व है।
यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं ने काली नाग, हयान, गण ठाक, गौ-पीड़ा, रामतुंड और शंख पाडर सहित विभिन्न पवित्र स्थलों पर पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान किए। इन अनुष्ठानों के बाद छड़ी मुबारक को कैलाश कुंड ले जाया गया, जहां अंतिम धार्मिक रस्में संपन्न की गईं।
कैलाश कुंड में धार्मिक अनुष्ठान और स्नान संपन्न करने के बाद पवित्र छड़ी वापस भद्रवाह के लिए रवाना हुई। वीरवार शाम छड़ी के वासुक डेरा पहुंचने पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उसके स्वागत के लिए एकत्र हुए। भगवान वासुकी नाग के जयकारों के बीच श्रद्धालुओं ने छड़ी मुबारक का स्वागत किया और पूजा-अर्चना की।
छड़ी मुबारक के गाठा स्थित ऐतिहासिक वासुकी नाग मंदिर में वापस पहुंचने के साथ ही भद्रवाह की सदियों पुरानी तीन दिवसीय कैलाश यात्रा धार्मिक आस्था, परंपरा और उत्साह के बीच संपन्न हो गई।