{"_id":"67575c4e9bb0b0ded706cd7b","slug":"cultural-news-udhampur-news-c-202-1-sjam1011-118136-2024-12-10","type":"story","status":"publish","title_hn":"संसार में हर मानव दुखों से त्रस्त : सुभाष शास्त्री","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
संसार में हर मानव दुखों से त्रस्त : सुभाष शास्त्री
विज्ञापन
छप्पर बारटा में कथा के उपस्थित संगत।
- फोटो : छप्पर बारटा में कथा के उपस्थित संगत।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
उधमपुर। छप्पर, बारटा में जारी श्रीमद्भागवत कथा में सोमवार को तीसरे दिन संत सुभाष शास्त्री ने कहा कि संसार में हर मानव दुखों से त्रस्त है, कारण वह संसार के साथ स्वयं को बांध बैठा है और जब तक वह इससे मुक्त नहीं होगा, उसके दुखों का अंत संभव ही नहीं है।
उन्होंने कहा कि इस जगत के बंधन से मुक्त होने के लिए निसंकल्प होना अति आवश्यक है। जब तक संकल्प होते रहते हैं, तब तक चंचल मन की क्रिया बंद नहीं होती। मन का निसंकल्प इतना सहज भी नहीं है, तो फिर क्या करें ? उपाय यह है कि जगत के संकल्पों को छोड़कर भगवत संकल्प करें। ऐसा संकल्प करते हुए मुख से प्रभु के नाम का उच्चारण व हृदय, मन और आंखों में प्रभु की छवि को धारण करना चाहिए। ऐसा साधक सहजता से प्रभु के अनुग्रह का अधिकारी बन जाता है और परिणामस्वरूप कष्टों से छुटकारा पा लेता है।
सुभाष शास्त्री ने कहा कि जब व्यक्ति भगवान के नाम पर आश्रित हो जाता है तो वह स्वतः ही धर्म के मार्ग पर चलता हुआ जीवनयापन करता है। उन्होंने समझाया कि पत्नी, संतान, बीमारी, धन, विद्या, व्यवसाय, इन सभी के प्रति कभी लापरवाह न रहें। माता-पिता, गुरु, मालिक, भाई, पुत्र व मित्र इनकी कभी उपेक्षा न करें। परिवार के सदस्यों, भाइयों, पड़ोसियों, बच्चों, वृद्धों, रोगियों और जो अपने पर आश्रित हों, उनसे कटु बचन न कहें। यह धार्मिक मनुष्य के लिए कुछ नियम हैं, जिनका पालन करें।
विज्ञापन
उन्होंने कहा कि मनुष्य यदि मन में मृत्यु की याद सदा रखे तो उसका आचरण ऐसा पवित्र, हो सकता है जैसे कुंआरी, काया अर्थात शुद्ध। आप यदि अपना आचरण सुधार लें तो समझो परमात्मा को प्राप्त करना इतना ही सरल हो जाएगा। जितना एक शिशु का अपनी मां की गोद में बैठना सरल होता है क्योंकि शिशु के मन में सांसारिक वैर विरोध नहीं होता।
फोटो सहित
विज्ञापन
उन्होंने कहा कि इस जगत के बंधन से मुक्त होने के लिए निसंकल्प होना अति आवश्यक है। जब तक संकल्प होते रहते हैं, तब तक चंचल मन की क्रिया बंद नहीं होती। मन का निसंकल्प इतना सहज भी नहीं है, तो फिर क्या करें ? उपाय यह है कि जगत के संकल्पों को छोड़कर भगवत संकल्प करें। ऐसा संकल्प करते हुए मुख से प्रभु के नाम का उच्चारण व हृदय, मन और आंखों में प्रभु की छवि को धारण करना चाहिए। ऐसा साधक सहजता से प्रभु के अनुग्रह का अधिकारी बन जाता है और परिणामस्वरूप कष्टों से छुटकारा पा लेता है।
विज्ञापन
सुभाष शास्त्री ने कहा कि जब व्यक्ति भगवान के नाम पर आश्रित हो जाता है तो वह स्वतः ही धर्म के मार्ग पर चलता हुआ जीवनयापन करता है। उन्होंने समझाया कि पत्नी, संतान, बीमारी, धन, विद्या, व्यवसाय, इन सभी के प्रति कभी लापरवाह न रहें। माता-पिता, गुरु, मालिक, भाई, पुत्र व मित्र इनकी कभी उपेक्षा न करें। परिवार के सदस्यों, भाइयों, पड़ोसियों, बच्चों, वृद्धों, रोगियों और जो अपने पर आश्रित हों, उनसे कटु बचन न कहें। यह धार्मिक मनुष्य के लिए कुछ नियम हैं, जिनका पालन करें।
विज्ञापन
उन्होंने कहा कि मनुष्य यदि मन में मृत्यु की याद सदा रखे तो उसका आचरण ऐसा पवित्र, हो सकता है जैसे कुंआरी, काया अर्थात शुद्ध। आप यदि अपना आचरण सुधार लें तो समझो परमात्मा को प्राप्त करना इतना ही सरल हो जाएगा। जितना एक शिशु का अपनी मां की गोद में बैठना सरल होता है क्योंकि शिशु के मन में सांसारिक वैर विरोध नहीं होता।
फोटो सहित