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Srinagar News: श्रीनगर में पेयजल की बर्बादी पर सरकार सख्त, 40 फीसदी पानी बगीचों में बहाया जा रहा, अब सिंचाई के लिए इस्तेमाल होगा ट्रीटेड वाटर
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-आवास और शहरी विकास विभाग की प्रशासनिक सचिव मंदीप कौर ने जताई चिंता, शहर की जल वितरण प्रणाली को सुव्यवस्थित करने की कवायद शुरू
अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। शहर में पीने के पानी के दुरुपयोग को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। आवास व शहरी विकास विभाग के अनुसार श्रीनगर में आपूर्ति होने वाला शुद्ध पेयजल का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा घरों के बगीचों की सिंचाई में बहा दिया जाता है। इस पर सरकार ने सख्ती की है। अब सिंचाई के लिए ट्रीटेड पानी का इस्तेमाल होगा।
पेयजल की इस भारी बर्बादी को रोकने के लिए अब सरकार ने बड़ा कदम उठाने का फैसला किया है। सरकार अब गैर-पेयजल उद्देश्यों, जैसे बगीचों की सिंचाई और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से साफ किए गए ट्रीटेड पानी के उपयोग को बढ़ावा देने की योजना पर काम कर रही है।
आवास और शहरी विकास विभाग की कमिश्नर सचिव मंदीप कौर ने कहा कि सरकार इस समय श्रीनगर शहर के जल आपूर्ति नेटवर्क को तर्कसंगत बनाने की दिशा में काम कर रही है। सरकार का पूरा ध्यान इस बात पर है कि पूरे श्रीनगर में हर परिवार को जरूरत के मुताबिक पर्याप्त पानी उपलब्ध हो सके। उन्होंने जल आपूर्ति के दो प्रमुख पहलुओं का जिक्र करते हुए कहा कि पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना एक बात है लेकिन उसका सही और समान वितरण करना दूसरी बात है, जिसमें फिलहाल श्रीनगर शहर काफी पीछे है।
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सचिव मंदीप कौर ने शहर की जल व्यवस्था के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौती का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां घरों में खाना पकाने और पीने के लिए इस्तेमाल होने वाले शुद्ध पानी का ही उपयोग बगीचों को सींचने के लिए किया जा रहा है। देश के अधिकांश बड़े और आधुनिक शहरों में बगीचों की सिंचाई के लिए बिना ट्रीट किया हुआ या कच्चा पानी अलग से सप्लाई किया जाता है और उसके लिए बाकायदा एक अलग बुनियादी ढांचा होता है जो मौजूदा समय में श्रीनगर शहर के भीतर गायब है।
हाल ही में विभाग की ओर से किए गए एक मूल्यांकन का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि बिना किसी शुल्क या भुगतान के करीब 40 फीसदी पीने का पानी सिर्फ पेड़-पौधों में डाल दिया जाता है। विभाग की भाषा में इसे नॉन-रेवेन्यू वाटर कहा जाता है। उन्होंने कहा कि सीमित वित्तीय संसाधनों के बावजूद सरकार जल प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। हालांकि, उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि पानी जैसे अमूल्य संसाधन को बचाने के लिए आम जनता की भागीदारी और जागरूकता बेहद जरूरी है।
शुद्ध पेयजल पर निर्भरता को कम करने के लिए सचिव ने बताया कि सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता अब सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से निकलने वाले उपचारित पानी (ट्रीटेड वाटर) का पुन: उपयोग करने की है। भविष्य की कार्ययोजना को साझा करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि शहर में जहां कहीं भी सिंचाई या व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए इस साफ किए गए पानी का उपयोग किया जा सकता है, वहां पीने के पानी की सप्लाई को तुरंत रोककर उसे इस ट्रीटेड वाटर से बदल दिया जाएगा।
इसके साथ ही उन्होंने श्रीनगर के नागरिकों को आश्वस्त किया कि जल वितरण प्रणाली को सुधारने का काम तेजी से चल रहा है और जिन इलाकों में वर्तमान में पानी की किल्लत देखी जा रही है, वहां विभाग की ओर से टैंकरों के माध्यम से पानी की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है।
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अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। शहर में पीने के पानी के दुरुपयोग को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। आवास व शहरी विकास विभाग के अनुसार श्रीनगर में आपूर्ति होने वाला शुद्ध पेयजल का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा घरों के बगीचों की सिंचाई में बहा दिया जाता है। इस पर सरकार ने सख्ती की है। अब सिंचाई के लिए ट्रीटेड पानी का इस्तेमाल होगा।
पेयजल की इस भारी बर्बादी को रोकने के लिए अब सरकार ने बड़ा कदम उठाने का फैसला किया है। सरकार अब गैर-पेयजल उद्देश्यों, जैसे बगीचों की सिंचाई और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से साफ किए गए ट्रीटेड पानी के उपयोग को बढ़ावा देने की योजना पर काम कर रही है।
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आवास और शहरी विकास विभाग की कमिश्नर सचिव मंदीप कौर ने कहा कि सरकार इस समय श्रीनगर शहर के जल आपूर्ति नेटवर्क को तर्कसंगत बनाने की दिशा में काम कर रही है। सरकार का पूरा ध्यान इस बात पर है कि पूरे श्रीनगर में हर परिवार को जरूरत के मुताबिक पर्याप्त पानी उपलब्ध हो सके। उन्होंने जल आपूर्ति के दो प्रमुख पहलुओं का जिक्र करते हुए कहा कि पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना एक बात है लेकिन उसका सही और समान वितरण करना दूसरी बात है, जिसमें फिलहाल श्रीनगर शहर काफी पीछे है।
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सचिव मंदीप कौर ने शहर की जल व्यवस्था के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौती का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां घरों में खाना पकाने और पीने के लिए इस्तेमाल होने वाले शुद्ध पानी का ही उपयोग बगीचों को सींचने के लिए किया जा रहा है। देश के अधिकांश बड़े और आधुनिक शहरों में बगीचों की सिंचाई के लिए बिना ट्रीट किया हुआ या कच्चा पानी अलग से सप्लाई किया जाता है और उसके लिए बाकायदा एक अलग बुनियादी ढांचा होता है जो मौजूदा समय में श्रीनगर शहर के भीतर गायब है।
हाल ही में विभाग की ओर से किए गए एक मूल्यांकन का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि बिना किसी शुल्क या भुगतान के करीब 40 फीसदी पीने का पानी सिर्फ पेड़-पौधों में डाल दिया जाता है। विभाग की भाषा में इसे नॉन-रेवेन्यू वाटर कहा जाता है। उन्होंने कहा कि सीमित वित्तीय संसाधनों के बावजूद सरकार जल प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। हालांकि, उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि पानी जैसे अमूल्य संसाधन को बचाने के लिए आम जनता की भागीदारी और जागरूकता बेहद जरूरी है।
शुद्ध पेयजल पर निर्भरता को कम करने के लिए सचिव ने बताया कि सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता अब सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से निकलने वाले उपचारित पानी (ट्रीटेड वाटर) का पुन: उपयोग करने की है। भविष्य की कार्ययोजना को साझा करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि शहर में जहां कहीं भी सिंचाई या व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए इस साफ किए गए पानी का उपयोग किया जा सकता है, वहां पीने के पानी की सप्लाई को तुरंत रोककर उसे इस ट्रीटेड वाटर से बदल दिया जाएगा।
इसके साथ ही उन्होंने श्रीनगर के नागरिकों को आश्वस्त किया कि जल वितरण प्रणाली को सुधारने का काम तेजी से चल रहा है और जिन इलाकों में वर्तमान में पानी की किल्लत देखी जा रही है, वहां विभाग की ओर से टैंकरों के माध्यम से पानी की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है।