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हिरासत अवधि पूरी होने पर भी याचिका को निष्फल घोषित करना पड़ता है : हाईकोर्ट

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Srinagar, Jammu Kashmir Highcourt, Hearing , Gave Order
- जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने हेबियस कॉर्पस याचिका को निष्फल घोषित कर निपटाने को बताया पीड़ादायक
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संवाद न्यूज एजेंसी

श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख उच्च न्यायालय ने वीरवार को एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि एक सांविधानिक अदालत को हिरासत अवधि पूरी होने के बाद भी हेबियस कॉर्पस याचिका को निष्फल घोषित करके निपटाना पड़ता है। यह काफी पीड़ा दायक है।
न्यायमूर्ति राहुल भारती की एकल पीठ ने शाकिर अहमद लोन की ओर से दायर याचिका का निपटारा करते हुए निर्देश दिया कि निरोधात्मक हिरासत मामलों में काउंटर हलफनामा समय पर दाखिल करने और निरोध रिकॉर्ड तुरंत पेश करने के लिए उचित तंत्र स्थापित किया जाए ताकि कानून के शासन को शर्मिंदगी से बचाया जा सके।
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शाकिर अहमद लोन ने डिवीजनल कमिश्नर द्वारा 13 दिसंबर 2024 को जारी निरोध आदेश को चुनौती दी थी। उन्हें 19 दिसंबर 2024 को हिरासत में लिया गया था और उन्होंने 18 फरवरी 2025 को अदालत का रुख किया था यानी हिरासत के दो महीने के भीतर।
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हालांकि, अदालत ने कहा कि हेबियस कॉर्पस याचिका को उचित तात्कालिकता से सुनने में असमर्थता और अधिकारियों द्वारा काउंटर हलफनामा दाखिल करने में छह महीने की देरी के कारण मामला लंबित रहा, जिससे अधिकतम एक वर्ष की निरोध अवधि समाप्त हो गई। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसी देरी हेबियस कॉर्पस क्षेत्राधिकार के उद्देश्य को ही विफल कर देती है जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता दांव पर लगी हो तो न्यायिक जांच तुरंत होनी चाहिए। अदालत ने कहा, याचिकाकर्ता के वकील की यह गुहार कि याचिका को निष्फल घोषित कर खारिज किया जाए, एक संवैधानिक अदालत के लिए सुनना सबसे अधिक पीड़ादायक है।




इस याचिका के निष्फल होने का एक सहायक कारण यह भी था कि प्रतिवादी (अधिकारी) ने छह महीने लगाए काउंटर हलफनामा दाखिल करने में, जबकि निरोधित व्यक्ति के लिए अधिकतम निरोध अवधि एक वर्ष निर्धारित थी। अदालत ने सरकार के कानून, न्याय एवं संसदीय कार्य विभाग के कमिश्नर सेक्रेटरी को चेतावनी दी कि सरकार के स्तर पर विशेष रूप से निरोध आदेश जारी करने वाली प्राधिकरण और गृह विभाग के अंत में उचित तंत्र स्थापित किया जाए।
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