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कश्मीर की सामूहिक आवाज को कमजोर करने के लिए बनाए जा रहे नए सियासी दल : डॉ. फारूक
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- अनुच्छेद 370 की बहाली तक जारी रहेगा संघर्ष; पीडीपी पर साधा निशाना-भाजपा से हाथ मिलाकर जम्मू-कश्मीर को किया तबाह
अमर उजाला ब्यूरो
बारामुला। नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने उत्तरी कश्मीर में जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि कश्मीर के लोगों की सामूहिक राजनीतिक आवाज को खंडित करने और उनके जनादेश को कमजोर करने की साजिशें लगातार जारी हैं। उन्होंने कहा कि जहां जम्मू संभाग में राजनीतिक दलों की संख्या सीमित है, वहीं कश्मीर घाटी में हर मोड़ पर नए-नए राजनीतिक संगठन खड़े किए जा रहे हैं, ताकि कश्मीरी अवाम की आवाज को बांटकर कमजोर किया जा सके।
उन्होंने जम्मू-कश्मीर के लोगों से आपसी मतभेद भुलाकर एकजुट होने का आह्वान किया और कहा कि बिना एकजुटता के अधिकारों की बहाली की लड़ाई अधूरी रहेगी।
जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे की बहाली के प्रति पार्टी की प्रतिबद्धता दोहराते हुए डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस जनता के संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी लड़ाई जारी रखेगी। उन्होंने अनुच्छेद 370 की संवैधानिक स्थिति का उल्लेख करते हुए दावा किया कि इसे भारतीय संविधान में स्थायी दर्जा प्राप्त था। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यदि जनता एकजुट रही, तो वे अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को हासिल करने में अंततः अवश्य सफल होंगे।
देश के विभिन्न हिस्सों, विशेषकर भाजपा शासित राज्यों में अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे व्यवहार पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि अल्पसंख्यक समुदायों, विशेष रूप से मुसलमानों के घरों, दुकानों और मस्जिदों को सुनियोजित तरीके से निशाना बनाया जा रहा है।
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उन्होंने कश्मीर के उन नेताओं और समूहों पर तीखा हमला बोला जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा का समर्थन करते हैं। फारूक अब्दुल्ला ने सवाल किया कि ऐसे हालात देखकर उनका जमीर कैसे चुप रह सकता है? उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा शासकों ने जम्मू-कश्मीर के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को गहरा नुकसान पहुंचाया है।
पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी पर तीखा हमला बोलते हुए डॉ. फारूक ने कहा कि पीडीपी ने भाजपा के साथ गठबंधन करके जम्मू-कश्मीर को बर्बादी के रास्ते पर धकेल दिया। उन्होंने कहा कि आज वही पीडीपी नेता खुद को जनता का हमदर्द साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि आज जम्मू-कश्मीर की जनता जो परेशानियां झेल रही है, वे स्वर्गीय मुफ्ती मोहम्मद सईद और महबूबा मुफ्ती के कार्यकाल में लिए गए फैसलों का ही नतीजा हैं।
केंद्र शासित प्रदेश के मौजूदा प्रशासनिक ढांचे पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर की चुनी हुई सरकार और विधायक सीमित अधिकारों व विषम परिस्थितियों के बावजूद जनता की समस्याओं को हल करने में जुटे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार को बदनाम करने वाले कुछ लोगों की आलोचना केवल आर्थिक हितों से प्रेरित है।
पत्रकारों और मीडिया की स्थिति पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि आज सच सामने लाने वाले पत्रकारों पर अत्यधिक दबाव है। जमीनी हकीकत और लोगों की समस्याओं को प्रमुखता से उठाने पर पत्रकारों को प्रताड़ित किया जाता है और पुलिस थानों तक तलब किया जाता है।
13 जुलाई के शहीदी दिवस की आधिकारिक छुट्टी बहाल करने की मांग
डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने 13 जुलाई 1931 के शहीदों की आधिकारिक सरकारी छुट्टी को समाप्त किए जाने की कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक बलिदानों और जनभावनाओं का हर हाल में सम्मान होना चाहिए।
उपराज्यपाल प्रशासन प्रणाली पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि नीति-निर्माण और निर्णय लेने की प्रक्रिया में उन जन-प्रतिनिधियों की सार्थक भूमिका होनी चाहिए, जो स्थानीय यथार्थ और जनता की आकांक्षाओं को भली-भांति समझते हों। अंत में उन्होंने लोगों से अल्लाह के आगे धैर्य, साहस और शक्ति की दुआ मांगने तथा अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण व लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रखने की अपील की।
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अमर उजाला ब्यूरो
बारामुला। नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने उत्तरी कश्मीर में जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि कश्मीर के लोगों की सामूहिक राजनीतिक आवाज को खंडित करने और उनके जनादेश को कमजोर करने की साजिशें लगातार जारी हैं। उन्होंने कहा कि जहां जम्मू संभाग में राजनीतिक दलों की संख्या सीमित है, वहीं कश्मीर घाटी में हर मोड़ पर नए-नए राजनीतिक संगठन खड़े किए जा रहे हैं, ताकि कश्मीरी अवाम की आवाज को बांटकर कमजोर किया जा सके।
उन्होंने जम्मू-कश्मीर के लोगों से आपसी मतभेद भुलाकर एकजुट होने का आह्वान किया और कहा कि बिना एकजुटता के अधिकारों की बहाली की लड़ाई अधूरी रहेगी।
जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे की बहाली के प्रति पार्टी की प्रतिबद्धता दोहराते हुए डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस जनता के संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी लड़ाई जारी रखेगी। उन्होंने अनुच्छेद 370 की संवैधानिक स्थिति का उल्लेख करते हुए दावा किया कि इसे भारतीय संविधान में स्थायी दर्जा प्राप्त था। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यदि जनता एकजुट रही, तो वे अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को हासिल करने में अंततः अवश्य सफल होंगे।
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देश के विभिन्न हिस्सों, विशेषकर भाजपा शासित राज्यों में अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे व्यवहार पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि अल्पसंख्यक समुदायों, विशेष रूप से मुसलमानों के घरों, दुकानों और मस्जिदों को सुनियोजित तरीके से निशाना बनाया जा रहा है।
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उन्होंने कश्मीर के उन नेताओं और समूहों पर तीखा हमला बोला जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा का समर्थन करते हैं। फारूक अब्दुल्ला ने सवाल किया कि ऐसे हालात देखकर उनका जमीर कैसे चुप रह सकता है? उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा शासकों ने जम्मू-कश्मीर के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को गहरा नुकसान पहुंचाया है।
पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी पर तीखा हमला बोलते हुए डॉ. फारूक ने कहा कि पीडीपी ने भाजपा के साथ गठबंधन करके जम्मू-कश्मीर को बर्बादी के रास्ते पर धकेल दिया। उन्होंने कहा कि आज वही पीडीपी नेता खुद को जनता का हमदर्द साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि आज जम्मू-कश्मीर की जनता जो परेशानियां झेल रही है, वे स्वर्गीय मुफ्ती मोहम्मद सईद और महबूबा मुफ्ती के कार्यकाल में लिए गए फैसलों का ही नतीजा हैं।
केंद्र शासित प्रदेश के मौजूदा प्रशासनिक ढांचे पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर की चुनी हुई सरकार और विधायक सीमित अधिकारों व विषम परिस्थितियों के बावजूद जनता की समस्याओं को हल करने में जुटे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार को बदनाम करने वाले कुछ लोगों की आलोचना केवल आर्थिक हितों से प्रेरित है।
पत्रकारों और मीडिया की स्थिति पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि आज सच सामने लाने वाले पत्रकारों पर अत्यधिक दबाव है। जमीनी हकीकत और लोगों की समस्याओं को प्रमुखता से उठाने पर पत्रकारों को प्रताड़ित किया जाता है और पुलिस थानों तक तलब किया जाता है।
13 जुलाई के शहीदी दिवस की आधिकारिक छुट्टी बहाल करने की मांग
डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने 13 जुलाई 1931 के शहीदों की आधिकारिक सरकारी छुट्टी को समाप्त किए जाने की कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक बलिदानों और जनभावनाओं का हर हाल में सम्मान होना चाहिए।
उपराज्यपाल प्रशासन प्रणाली पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि नीति-निर्माण और निर्णय लेने की प्रक्रिया में उन जन-प्रतिनिधियों की सार्थक भूमिका होनी चाहिए, जो स्थानीय यथार्थ और जनता की आकांक्षाओं को भली-भांति समझते हों। अंत में उन्होंने लोगों से अल्लाह के आगे धैर्य, साहस और शक्ति की दुआ मांगने तथा अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण व लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रखने की अपील की।