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Srinagar News: 1997 के खादी ग्रामोद्योग बोर्ड लोन घोटाले केस में नौ आरोपी बरी

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Nine Accused Released in Scam
अमर उजाला ब्यूरो
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श्रीनगर। स्थानीय अदालत ने खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड (केवीआईबी) से जुड़े लगभग तीन दशक पुराने एक लोन घोटाले के मामले में नौ आरोपियों को शुक्रवार को बरी कर दिया।
श्रीनगर की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट तबस्सुम की अदालत ने यह आदेश पारित किया। इस मामले की सुनवाई शुरू में यहां की विशेष न्यायाधीश, भ्रष्टाचार-निरोधक अदालत में हुई थी क्योंकि कुछ सरकारी कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार-निरोधक अधिनियम के तहत अपराधों का भी आरोप था। पिछले साल 10 जुलाई को, विशेष न्यायाधीश, भ्रष्टाचार-निरोधक अदालत ने आरोपी सरकारी कर्मचारियों को जम्मू कश्मीर भ्रष्टाचार-निरोधक अधिनियम की धारा 5(2) के तहत अपराधों से बरी कर दिया। इसका आधार यह था कि अभियोजन की मंजूरी अमान्य थी। उन्होंने इस मामले को केवल आरपीसी के तहत अपराधों पर विचार करने के लिए सीजेएम श्रीनगर को भेज दिया।
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यह था मामला
यह मामला 1997 में केवीआईबी लोन की मंजूरी और बांटने में कथित गड़बड़ियों से जुड़ा था। कथित तौर पर नकली दस्तावेजों के आधार पर नकली लाभार्थी को लोन जारी किए गए थे। कोर्ट ने माना कि आरोपियों के खिलाफ कथित अपराधों के जरूरी हिस्से नहीं बने। आरपीसी की धारा 409 के तहत क्रिमिनल ब्रीच ऑफ ट्रस्ट के आरोप पर अदालत ने कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे पता चले कि आरोपियों को कभी सरकारी फंड दिए गए थे या उन पर उनका दबदबा था।
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आरपीसी की धारा 468 के तहत जालसाजी के मामले में अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष किसी भी ऐसे खास दस्तावेज की पहचान करने में नाकाम रहा जिसकी कथित तौर पर किसी आरोपी ने जालसाजी की हो। दस्तावेजों की जालसाजी से उन्हें जोड़ने वाला कोई भी फोरेंसिक सबूत या विशेषज्ञ की राय रिकॉर्ड पर पेश नहीं की गई। इसी तरह, आरपीसी की धारा 419 के तहत पहचान बदलकर धोखाधड़ी करने के मामले में अदालत को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला कि किसी आरोपी ने कर्ज लेने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल किया हो। अदालत ने जोर देकर कहा कि ऐसा कोई भी सबूत नहीं था जिससे यह पता चले कि आरोपियों के बीच कोई आपसी सहमति या किसी गैर-कानूनी काम को करने का कोई समझौता हुआ हो। अदालत ने टिप्पणी की, फाइलों पर काम करने वाले अधिकारियों का आपस में जुड़ा होना ही साजिश नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि केवीआईबी ने विभागीय कार्यवाही के माध्यम से पहले ही लगभग 6.29 लाख रुपये वसूल कर लिए थे जिससे कथित वित्तीय नुकसान की भरपाई हो गई थी।
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