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Srinagar News: रिश्वत मामले में पूर्व तहसीलदार की सजा निलंबित
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हाईकोर्ट ने एक पूर्व तहसीलदार की सजा निलंबित कर दी है। उसे इस हफ्ते की शुरुआत में 2010 के एक रिश्वत मामले में दोषी ठहराया गया था।
जस्टिस राहुल भारती की बेंच ने पूर्व राजस्व अधिकारी, मोहम्मद अकरम खान को जमानत भी दे दी और उनकी दोषसिद्धि के खिलाफ उनकी अपील स्वीकार कर ली।
कोर्ट ने शुरुआती सुनवाई के बाद मामले में शिकायतकर्ता की गवाही में अंतर्निहित कमियों और विरोधाभासों की ओर इशारा करते हुए ये आदेश दिए। इसमें पाया गया कि खान की चुनौती की जांच के लिए प्रथम दृष्टया मामला बनता है।
खान को जज, एंटी-करप्शन श्रीनगर ने 23 मार्च को रणबीर दंड संहिता की धारा 161 के तहत दोषी ठहराया था। एक साल की साधारण कारावास के साथ 20,000 रुपये का जुर्माना लगाया था। हालांकि, उन्हें जम्मू-कश्मीर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आरोपों से बरी कर दिया गया था।
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ट्रायल कोर्ट का फैसला मई 2010 में तत्कालीन विजिलेंस ऑर्गेनाइजेशन कश्मीर (अब एंटी-करप्शन ब्यूरो) द्वारा दर्ज की गई एफआईआर पर आया था। इसमें आरोप लगाया गया था कि खान ने एक जमीन विवाद के सिलसिले में 20,000 रुपये की रिश्वत मांगी थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार इसके बाद एक जाल बिछाया गया और कथित तौर पर उनके आवास से वह राशि बरामद की गई।
वरिष्ठ वकील बीए बशीर के माध्यम से अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए खान ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट का फैसला विकृत और अस्थिर था।
दलीलों पर संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और सरकार को नोटिस जारी किया। सजा भी निलंबित कर दी और निर्देश दिया कि खान को 1 लाख रुपये के व्यक्तिगत और जमानत बांड जमा करने पर जमानत पर रिहा किया जाए।
कोर्ट ने खान को निर्देश दिया कि वे सुनवाई की हर तारीख पर मौजूद रहें, जब तक कि उन्हें छूट न दी गई हो। आगे की जांच के लिए ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड तलब किए। कोर्ट ने सेंट्रल जेल श्रीनगर के सुपरिंटेंडेंट से दस्तावेजों के सत्यापन में कथित प्रक्रियात्मक चूकों पर भी स्पष्टीकरण मांगा।
इस आदेश को जारी करने से पहले यह न्यायालय श्रीनगर सेंट्रल जेल के सुपरिटेंडेंट को निर्देश देता है कि वे स्पष्ट करें कि अपील मेमो पर हस्ताक्षर श्रीनगर सेंट्रल जेल के असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट के समक्ष कैसे हुए। उस पर कहीं भी कोई सील, मुहर या कोई ऐसा समर्थन अंकित नहीं है, जिससे यह प्रमाणित हो सके कि अपीलकर्ता (खान) द्वारा अपील मेमो पर किए गए हस्ताक्षर व शपथ-पत्रों और वकालतनामा पर किए गए हस्ताक्षर उनकी उपस्थिति में ही संपन्न हुए थे।
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जस्टिस राहुल भारती की बेंच ने पूर्व राजस्व अधिकारी, मोहम्मद अकरम खान को जमानत भी दे दी और उनकी दोषसिद्धि के खिलाफ उनकी अपील स्वीकार कर ली।
कोर्ट ने शुरुआती सुनवाई के बाद मामले में शिकायतकर्ता की गवाही में अंतर्निहित कमियों और विरोधाभासों की ओर इशारा करते हुए ये आदेश दिए। इसमें पाया गया कि खान की चुनौती की जांच के लिए प्रथम दृष्टया मामला बनता है।
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खान को जज, एंटी-करप्शन श्रीनगर ने 23 मार्च को रणबीर दंड संहिता की धारा 161 के तहत दोषी ठहराया था। एक साल की साधारण कारावास के साथ 20,000 रुपये का जुर्माना लगाया था। हालांकि, उन्हें जम्मू-कश्मीर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आरोपों से बरी कर दिया गया था।
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ट्रायल कोर्ट का फैसला मई 2010 में तत्कालीन विजिलेंस ऑर्गेनाइजेशन कश्मीर (अब एंटी-करप्शन ब्यूरो) द्वारा दर्ज की गई एफआईआर पर आया था। इसमें आरोप लगाया गया था कि खान ने एक जमीन विवाद के सिलसिले में 20,000 रुपये की रिश्वत मांगी थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार इसके बाद एक जाल बिछाया गया और कथित तौर पर उनके आवास से वह राशि बरामद की गई।
वरिष्ठ वकील बीए बशीर के माध्यम से अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए खान ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट का फैसला विकृत और अस्थिर था।
दलीलों पर संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और सरकार को नोटिस जारी किया। सजा भी निलंबित कर दी और निर्देश दिया कि खान को 1 लाख रुपये के व्यक्तिगत और जमानत बांड जमा करने पर जमानत पर रिहा किया जाए।
कोर्ट ने खान को निर्देश दिया कि वे सुनवाई की हर तारीख पर मौजूद रहें, जब तक कि उन्हें छूट न दी गई हो। आगे की जांच के लिए ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड तलब किए। कोर्ट ने सेंट्रल जेल श्रीनगर के सुपरिंटेंडेंट से दस्तावेजों के सत्यापन में कथित प्रक्रियात्मक चूकों पर भी स्पष्टीकरण मांगा।
इस आदेश को जारी करने से पहले यह न्यायालय श्रीनगर सेंट्रल जेल के सुपरिटेंडेंट को निर्देश देता है कि वे स्पष्ट करें कि अपील मेमो पर हस्ताक्षर श्रीनगर सेंट्रल जेल के असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट के समक्ष कैसे हुए। उस पर कहीं भी कोई सील, मुहर या कोई ऐसा समर्थन अंकित नहीं है, जिससे यह प्रमाणित हो सके कि अपीलकर्ता (खान) द्वारा अपील मेमो पर किए गए हस्ताक्षर व शपथ-पत्रों और वकालतनामा पर किए गए हस्ताक्षर उनकी उपस्थिति में ही संपन्न हुए थे।