{"_id":"63106fc8316e2f290b583947","slug":"jammu-kashmir-ladakh-high-court-said-employer-right-where-and-how-to-take-services-of-employee","type":"story","status":"publish","title_hn":"जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट: कर्मचारी की सेवाएं कहां और कैसे लेनी हैं, यह नियोक्ता का अधिकार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट: कर्मचारी की सेवाएं कहां और कैसे लेनी हैं, यह नियोक्ता का अधिकार
Thu, 01 Sep 2022 02:09 PM IST
kumar गुलशन कुमार
अमर उजाला नेटवर्क, श्रीनगर
अमर उजाला नेटवर्क, श्रीनगर
Published by: kumar गुलशन कुमार
Updated Thu, 01 Sep 2022 02:09 PM IST
सार
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने सीआरपीएफ के कमांडेंट की ओर से स्थानांतरण आदेश के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया है।
विज्ञापन
अदालत
- फोटो : file photo
विस्तार
किसी कर्मचारी की सेवाओं का उपयोग कहां और कैसे करना है, यह तय करना नियोक्ता के अधिकार क्षेत्र में है। कर्मचारी का स्थानांतरण भी इसी अधिकार क्षेत्र में आता है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने इसी टिप्पणी के साथ सीआरपीएफ के कमांडेंट की ओर से स्थानांतरण आदेश के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया।
सीआरपीएफ की 117 बटालियन के कमांडेंट मनोज कुमार ने याचिका में कहा कि इस साल 30 जून को उन्हें दक्षिण कश्मीर के वजीर बाग से स्थानांतरित कर आईजी पश्चिम बंगाल कार्यालय में रिपोर्ट करने का आदेश दिया गया। सामान्य रूप से एक स्टेशन पर तीन साल तक कार्यकाल होता है, जबकि उन्हें बीते वर्ष नौ सितंबर को ही मध्यप्रदेश से श्रीनगर स्थानांतरित किया गया था। फिर से स्थानांतरण पर उन्हें जोखिम भत्ते के रूप में मिलने वाली 25 हजार रुपये की अतिरिक्त राशि नहीं मिलेगी।
इसके अलावा उनके बच्चों की शिक्षा भी प्रभावित होगी। वे श्रीनगर में ही कोचिंग ले रहे हैं। न्यायाधीश जावेद इकबाल वानी ने इन दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि कर्मचारी की सेवा शर्तों में स्थानांतरण भी शामिल हैं।
विज्ञापन
सरकारी कर्मचारी की सेवाएं कब और कहां ली जानी हैं, उसका फैसला सरकार को ही करना है। न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट में मेजर आमोद कुमार बनाम केंद्र सरकार एवं अन्य के मामले में फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि जब तक वैधानिक नियमों का उल्लंघन न हो रहा हो, स्थानांतरण का फैसला नियोक्ता के विवेक पर निर्भर करता है।
विज्ञापन
सीआरपीएफ की 117 बटालियन के कमांडेंट मनोज कुमार ने याचिका में कहा कि इस साल 30 जून को उन्हें दक्षिण कश्मीर के वजीर बाग से स्थानांतरित कर आईजी पश्चिम बंगाल कार्यालय में रिपोर्ट करने का आदेश दिया गया। सामान्य रूप से एक स्टेशन पर तीन साल तक कार्यकाल होता है, जबकि उन्हें बीते वर्ष नौ सितंबर को ही मध्यप्रदेश से श्रीनगर स्थानांतरित किया गया था। फिर से स्थानांतरण पर उन्हें जोखिम भत्ते के रूप में मिलने वाली 25 हजार रुपये की अतिरिक्त राशि नहीं मिलेगी।
विज्ञापन
इसके अलावा उनके बच्चों की शिक्षा भी प्रभावित होगी। वे श्रीनगर में ही कोचिंग ले रहे हैं। न्यायाधीश जावेद इकबाल वानी ने इन दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि कर्मचारी की सेवा शर्तों में स्थानांतरण भी शामिल हैं।
विज्ञापन
सरकारी कर्मचारी की सेवाएं कब और कहां ली जानी हैं, उसका फैसला सरकार को ही करना है। न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट में मेजर आमोद कुमार बनाम केंद्र सरकार एवं अन्य के मामले में फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि जब तक वैधानिक नियमों का उल्लंघन न हो रहा हो, स्थानांतरण का फैसला नियोक्ता के विवेक पर निर्भर करता है।